लालदास जी की शेख इस्लाम से वार्ता
श्री प्राणनाथ लीलामृत - प्रसंग ११५
बुढ़ानपुर से श्री जी साहिब जी ने दोबारा काज़ी शेख इस्लाम को पैगाम भिजवाया । लालदास उनका पैगाम लेकर गए ।
काज़ी ने उन्हें अन्दर बुलाकर पूछा- "अब तक आप कहां थे और किस उद्देश्य से आए हैं ?"
लालदास ने उत्तर दिया- "मुझे हादी ने आपके पास भेजा है । उन्होंने आपके लिए जो पैगाम भेजा है, मुझे उसका जवाब दे दीजिए । इससे पहले मलूक चन्द ने अजमेर में आपको कुरान के कुछ प्रश्न दिए थे । उनका उत्तर भी इस बार दे दीजिए ।"
तब शेख इस्लाम ने कहा- "मैं आपसे यथार्थ कहता हूं कि कुरान के भेद तो आपको खुलते हैं । अभी तो मैं कहीं जा रहा हूं । आप कल प्रातः आइएगा, तब हम बात करेंगे ।"
दूसरे दिन प्रातः लालदास और नूर मुहम्मद ने शरीयत के सबसे बड़ा काज़ी शेख इस्लाम से भेंट की । वहां उसके यार भी बैठे थे । श्री जी द्वारा भेजे गए प्रश्नों की किताब मंगवाकर, वे सभी उस पर विचार करने बैठ गए ।
शरीयत को मानने वाले लोग बोले- "यह तो गलत लिखा है ।"
तब लालदास ने उत्तर दिया- "आप लोग कुरान की हदीसों के बारे में ऐसा कहते हैं, तो मैं आपसे कयामत के जाहिर होने की क्या बात करूं ?"
शेख इस्लाम ने कहा- "हम इन किताबों को गलत नहीं कहते । यह तो लिखने में चूक है । इसमें उमियों (अनपढ़ों) के दस्तखत (हस्ताक्षर) भी हैं ।"
तब लालदास ने उत्तर दिया- "इसमें लिखने वाले का कोई दोष नहीं है । आप इसका आन्तरिक अर्थ लें, तो उससे तत्काल आपको पहचान हो जाएगी ।"
जैसे ही काज़ी ने किताब अपने हाथ में ली, उसके दिल पर दुश्मन (दज्जाल) बैठ गया । उसने काज़ी का दिल फिरा दिया, जिस कारण वह मोमिनों से लड़ने लगा । काज़ी के पास प्रश्नों का कोई उत्तर नहीं था और वह हकीकत तक भी नहीं पहुंच पा रहा था । तब क्रोध में उसने मुख से कठोर बात कह दी ।
काज़ी ने कहा- "इस नई किताब में कुरान की आयतों को जोड़कर तुमने झूठी बात लिखी है और उसे इस्लाम बता रहे हो ।"
उसके सभी साथी बहुत डर दिखाने लगे कि ऐसी किताब के लिए उन्हें दण्डित किया जाएगा ।
तब लालदास को गुस्सा चढ़ा और उन्होंने काज़ी के हाथ से किताब ले ली । फिर काज़ी ने कहा कि यह किताब हम रखेंगे और लालदास के हाथ से किताब लेकर अपने सेवक को दे दी ।
तब काज़ी विनम्रता दिखाते हुए पूछने लगा- "अब तुम इसके बाबत क्या कहते हो ?"
तब लालदास सोचने लगे- "इनकी तो दृष्टि (नीयत) बदल चुकी है । यह तो मुझे मारने का संकल्प कर चुके हैं । अब ये कोई भी बात सुनने वाले नही हैं ।"
तब काज़ी ने मन में रोष रखते हुए विनम्रता से कहा- "तुम हमसे जो झूठी बात कहते हो, उस पर हमें बड़ा अफसोस हुआ । तुम हमसे इमामत का दावा करते हो और बार-बार यही बात कहते हो ।"
लालदास ने उत्तर दिया- "मैं आपसे क्या कहूं ? मैं तो वही बात कहता हूं, जो हज़रत (श्री जी) कहलवाते हैं ।"
तब काज़ी शेख इस्लाम व्यंग्य में बोला- "उन्होंने राह नहीं पाई ।"
श्री जी के लिए अपमानजनक बात सुनकर लालदास बहुत क्रोधित हो गए और बोले- "आपको ऐसे शब्द अपनी जुबान से नहीं कहने चाहिए थे । अब मैं आपको पैगाम देने कभी नहीं आऊंगा । अब हम इस्लाम (सच्चे दीन) को लेकर वापस अपने घर जा रहे हैं ।"
काज़ी के साथीजन बाद में लालदास जी को बुलाने लगे, परन्तु लालदास जी संकल्प कर चुके थे कि जिसके मुख से श्री जी का अपमान हुआ, उसका कभी मुख नहीं देखेंगे ।
कुरान के दसवें सिपारे में इस प्रसंग का वर्णन है-
"मोमिनों ने शरे के शैतान से बात की । कीनान का प्रमुख, जो शरे का काज़ी था, वह रसूल की दावत से मुनकर हुआ (मानने से मना कर दिया) । जब उसकी मोमिनों से बात हुई और मोमिनों ने हक की गुझ खिलवत की साहिदी (साक्षी) दी, तब वह मुनकर हो गया और प्रत्यक्ष झूठ बोलने लगा । कुरान में लिखा है कि काफिरों के दिल, आंख, जुबान और कान पर मुहर (ताला) है ।
"छठे जुम्मे के दिन जब मोमिनों का मिलावा हुआ, तब सारे जहान को इमाम (श्री जी साहिब जी) की पहचान हुई । तब दुनिया में जाहिर हो गया कि इस शरे के शैतान ने सुभान का रास्ता रोका था और हमें हकीकत व मारफत लेने नहीं दिया, इसलिए सबने उसे लानत दी ।"
अगला प्रसंग- लालदास जी की अब्दुल रहमान से भेंट
