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लालदास जी की अब्दुल रहमान से भेंट

श्री प्राणनाथ लीलामृत - प्रसंग ११६

यहां से चलकर लालदास जी मुफ्ती अब्दुल रहमान के घर आए और उन्हें सुभान (श्री जी) का पैगाम सुनाया । उन्हें काज़ी शेख इस्लाम के साथ हुई बातें भी सुनायीं ।

अन्त में लालदास ने कहा- "हम आपको पैगाम दे रहे हैं, जिससे हमें कोई दोष न लगे । अब आप यह नहीं कह सकते कि आपको नहीं कहा गया । इसे स्वीकार न करने पर बाद में आपको बहुत अफसोस होगा । हम तुम एक वतन के हैं, इसलिए जोर दे रहा हूं । हमने खुदा के रसूल (श्री जी) को देखा है, आप उन पर ईमान ले आओ ।"

मुफ्ती ने उत्तर दिया- "रसूल तो कयामत के वक्त आएगा, जो अभी दूर है । तुम आज यहां क्या ले आए हो ?"

लालदास ने पूछा- "किस किताब में लिखा है कि कयामत दूर है ?"

मुफ्ती ने कहा- "मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा कि दिल के संशय कैसे मिटेंगे ?"

लालदास ने उत्तर दिया- "आप किताब ले आओ । हम सब तारीखें समझाकर बता देंगे ।"

फिर लालदास ने उन्हें कुरान के सवाल दिखाए ।

उसे देखकर मुफ्ती ने उत्तर दिया- "तुमने बड़ी भूल की है, जो कुरान में लिखे किस्से इसमें डाल दिए । ये किस्से तो पुराने जमाने के हैं ।"

तब लालदास ने उत्तर दिया- "आपको कुरान की यही पहचान है ? ये सारे किस्से आज के हैं और रसूल भी आए हुए हैं । इसमें जो फरदा रोज कयामत की सरत लिखी थी, वही समय चल रहा है । रसूल के असहाब (साथी) मोमिन जाहिर हो गए हैं । आज हम आपसे कह रहे हैं, किन्तु बाद में हमें कोई दोष मत देना ।"

तीन दिन तक लालदास मुफ्ती अब्दुल रहमान के साथ रहे । तब नारायण दास के माध्यम से श्री जी की पाती मिली, जिसमें लिखा था- "अब आप वहां मत रहिए । पाती मिलने के बाद वहां पानी भी मत पीना, शीघ्र वापस आ जाओ । यह शरीयत के लोग आप पर तोहमत (आरोप) लगा सकते हैं । वहां दज्जाल का पहरा है, जो कयामत का दुश्मन है ।"

पाती पढ़कर लालदास तुरन्त नारायण दास के साथ चल पड़े । मार्ग में नूर मुहम्मद भी मिल गए । वे समझ चुके थे कि शरीयत को मानने वाले कभी ईमान नहीं ला सकते ।

तीसरे दिन वे लोग हादी श्री जी साहिब जी के चरणों में पहुंच गए । श्री जी से मिलाप करके उन्होंने अपनी सारी बीतक बताई । तब लालदास ने अक्षरातीत श्री राज की बहुत मेहेर देखी, जो उन्हें काल (मृत्यु) के मुख से निकालकर अपनी पनाह (संरक्षण) में ले आए ।

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