आकोट की बीतक
श्री प्राणनाथ लीलामृत - प्रसंग ११७
बुढ़ानपुर से श्री जी आकोट आए । वहां पर अव्वल खान अपने भाई के घर से भागकर श्री जी के पास आ गया । जिसे श्री जी के वास्तविक स्वरूप की पहचान हो गई हो, वह माया में कैसे रह सकता है ?
श्री जी ने उसे बहुत प्रेम से दिलासा देते हुए कहा- "तुम कुछ दिन भाइयों के साथ रह लो । घर पर रहते हुए भी तुम पर माया का कोई प्रभाव नहीं होगा । अब जागनी का काम तेजी से हो रहा है । जब हम एक स्थान पर स्थायी रूप से रहने लगेंगे, तब तुमको बुला लेंगे । तुम दुःखी मत हो, तुम हमारी आत्मा हो, तुम सच्चे शूरधीर हो, तुम्हारा मूल तन परमधाम में बैठा है ।"
आकोट के चौधरी को श्री जी पर थोड़ी श्रद्धा थी, परन्तु वह उन्हें लौकिक गुरु ही मानता था । दो-चार बार उसने श्री जी को सब सुन्दरसाथ सहित अपने घर बुलाकर भली-भांति से भोजन करवाया और आदर-सत्कार किया । उसने अपने अंकुर के अनुसार चर्चा, किरन्तन और सेवा का सुख लिया । श्री जी ने भी वहां उसकी भावना के अनुसार व्यवहार किया ।
अब श्री जी साहिब जी ने कुरान के कुछ प्रश्न लिखवाकर औरंगाबाद में फतह मुहम्मद को भिजवाए ।
उस पत्र में श्री जी ने यह लिखा-
"तुमने मुझसे लड़ने के लिए कमर कस ली थी । रसूल मुहम्मद के दिखाए मार्ग पर चलकर एक दीन होने वाला था, किन्तु तुम इसके आड़े आ गए । सब लोग इस्लाम (निजानन्द) में आने को तैयार थे, परन्तु तुमने सबका रास्ता रोक लिया । तुमने बिना समझे बातें करी और खुदा के दुश्मन बन गए ।
"अब जो सवाल लिखे हैं, यदि तुम आरिफ (ज्ञानी) हो तो उनका जवाब देना । यदि तुम इनके जवाब दे देते हो, तो हम तुम्हारे दीन में आने को तैयार हैं । हमें मुसलमान बनाकर दीन-ए-मुहम्मद में दाखिल करो । हम गुलाम बनकर तुम्हारी बात सुनने को तैयार हैं । तुम हमें कुरान की हकीकत समझाकर इस्लाम में दाखिल करो । जो कुछ उसमें लिखा है, हम वह सब करने को तैयार हैं ।
"जब तक तुम हमें सन्तुष्ट नहीं करते, तब तक तुमको खाना-पीना हराम है । तब तक तुम्हें कोई काम नहीं करना चाहिए । हम लाखों हिन्दू परिवार दीन-ए-इस्लाम में दाखिल होने के लिए तैयार हैं । इस काम को छोड़कर तुम कोई अन्य काम कैसे कर सकते हो ?
"कुरान में नाजी फिरके की सिफत (महिमा) लिखी है । अगर तुम उनमें से हो, तो उनके उतरने के बारे में बताओ ? मुहम्मद साहिब ने दरगाह (परमधाम) में १२००० रूहें कही हैं । अगर तुम उनमें से हो, तो हमें बताओ ?
"कुरान के अमेत सालून सिपारे में रूहों का मरातबा (महिमा) लिखा है । उनके समान कोई नहीं है । तुम जवाब दो कि इन सब में से तुम कौन हो ? मोमिन नूर बिलंद (परमधाम) से दुनिया में उतरे । अगर तुम उनकी कौम से हो, तो मुझे जवाब दो ?
"नसारों के गिरोह (ईसाइयों) में लाहूत (परमधाम) का संकेत में वर्णन है । अगर तुम उनमें से हो, तो हमें अपनी पहचान बताओ ? कुरान में यहूदियों (हिन्दुओं) की सिफत लिखी है, जिनके बीच में मुहम्मद (श्री जी) पातसाही करेंगे । अगर तुम उनमें से हो, तो हमें सूचना दो ?
"बनी असराईल (श्री जी) का गिरोह सबसे ऊपर (श्रेष्ठ) है । अगर तुम उनमें से हो, तो हमें अपनी पहचान करा दो ? बनी असराईल ने कयामत के निशान जाहिर कर दिए हैं । अगर तुम उनमें से हो, तो हमें संतुष्ट कर दो ? यदि तुमको इस सवालों के जवाब न आयें, तो हम बता देंगे ।"
इस तरह की बातें लिखकर श्री जी ने फतह मुहम्मद को भिजवायीं । जब उसे किसी भी सवाल का जवाब नहीं आया, तो वह बहुत शर्मिन्दा हुआ ।
ऐसे पत्र काज़ी हिदायतुल्ला, दीवान अमानत खान और बहादुर खान को भी भेजे । यह सन्देश लेकर मलूकचन्द, वीरजी, शेखबदल और लाल खान गए ।
आकोट से अनेक लोगों को सन्देश भेजे, परन्तु कोई भी इस्लाम (सच्चे धर्म) की पहचान नहीं कर सका, क्योंकि जिसका दिल मुर्दा हो वह इसे ग्रहण नहीं कर सकता ।
अगला प्रसंग- शुक्राना
