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ब्राह्मण की सुरता अखण्ड धाम पहुंची

श्री प्राणनाथ लीलामृत - प्रसंग ११९

आकोट में शुकदेव नामक एक ब्राह्मण, जो उदयपुर का रहने वाला था, श्री जी की चर्चा सुनने आया । वह बराड़ परगने के अधिकारी का सेवक था ।

जब उसने कबीर जी के वचनों पर आधारित श्री जी की चर्चा सुनी, तो उसके दिल में चोट लगी । उसे हकीकत (अक्षरधाम) का द्वार खुल गया । वह अपने शरीर को भूल गया और उसकी दृष्टि अखण्ड ब्रह्माण्ड में पहुंच गई ।

उसके मुख से बस एक ही बात निकलती थी- "तुम ही तुम हो, तुम से ही सब कुछ हुआ है ।"

वह ब्राह्मण घर जाकर बार-बार वापस आ जाता, जैसे कपड़ा बुनते समय ताना घूमकर वापस आ जाता है । इसी प्रकार वह घर से आता-जाता रहा ।

यदि उसे कोई बात कहो, तो वह एक ही उत्तर देता- "तुम ही तुम हो, तुम्हारे साथ हम आए हैं ।"

यदि चर्चा करके उसे कोई बात समझाते, तो भी उसके मुख से कोई अन्य बात नहीं निकलती । उसका चित्त मूल अक्षर के धाम में पूरी तरह लग गया था । वह ब्राह्मण हमेशा घर जाकर बिना रुके वापस लौट आता था ।

एक दिन प्रातः नदी किनारे श्री जी दातुन कर रहे थे, तो नदी के दूसरी तरफ से उन्हें देखकर वह उनकी तरफ चल पड़ा । मार्ग में उसे नदी भी नहीं दिखी और वह कपड़ों सहित नदी में गिर पड़ा । उसे अपने शरीर की कोई सुध नहीं थी और उसकी पाग भी उतर गई ।

सुन्दरसाथ ने दौड़कर उसे नदी से निकाला और उसके कपड़े सुखाकर पुनः पहनाए, परन्तु उस ब्राह्मण को कुछ सुध नहीं थी । जब उससे भोजन के बारे में पूछा, उसका भी उसे ज्ञान नहीं था । लोगों ने बताया कि उसने तीन दिन से कुछ नहीं खाया है ।

तब श्री जी ने उसका चित्त अक्षर धाम से हटा दिया । वह अपने घर वापस जाने को तैयार नहीं था, तो उसके भाइयों को बुलाया जो उसे डोली में बिठाकर ले गए । उसने अपने अंकुर के अनुसार लाभ लिया, उससे अधिक नहीं ले सका ।

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