आकोट से प्रस्थान
श्री प्राणनाथ लीलामृत - प्रसंग १२०
आकोट में श्री जी साहिब जी चार महीने रहे । वहां से प्रस्थान करके वे सब सुन्दरसाथ के साथ कापस्तानी आए । वहां उनकी चर्चा सुनकर दगड़ा और दत्ता ईमान ले आए । अमराजी भाई थोड़ी सी चर्चा सुनकर पूरे परिवार सहित सुन्दरसाथ में शामिल हो गए ।
पांच-दस दिन वहां रहकर श्री जी एलचपुर पहुंचे । वहां ज्वार की खेती करने वाले एक किसान ने तीन-चार दिन तक उत्सव-रसोई करके बहुत भाव से सबकी सेवा करी ।
वहां से चले तो मार्ग में एक फकीर मिला, जो कबीर जी की साखियां सुनाने लगा । जब उसने श्री जी के मुख से चर्चा सुनी तो भाव विभोर हो गया, परन्तु उनके स्वरूप की पहचान नहीं कर सका ।
इसके पश्चात् श्री जी चार दिन तक देवगढ़ में रहे । राम टेक के राजा को उन्होंने सन्देश भेजा, परन्तु वहां किसी ने उस पर विचार नहीं किया ।
इस यात्रा में श्री जी साहिब जी एक श्वेत घोड़े पर सवारी करते हैं और सब सुन्दरसाथ संग-संग पैदल चलते हैं । मार्ग में सुन्दरसाथ अपनी झोली में भिक्षा मांगकर लाते हैं । श्री जी को भोजन कराने के पश्चात् सब साथ आपस में भोजन बांटकर प्रेम से खाते हैं ।
श्री जी ने फकीरी (वैरागी) भेष धारण कर रखा है और उनके सब अंग शोभित हो रहे हैं । इस वैरागी भेष को धारण किए हुए अक्षरातीत के स्वरूप को मोमिनों ने तो पहचान लिया, परन्तु संसार के अंधे (अज्ञानी) जीव नहीं पहचान सके ।
देवगढ़ से श्री जी सब सुन्दरसाथ सहित रामनगर पहुंचे । इस यात्रा में कई मंजिलें आयीं, परन्तु रामनगर का सुख सबसे ऊपर है ।
अगला प्रसंग- रामनगर वृत्तान्त
