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रामनगर वृत्तान्त

श्री प्राणनाथ लीलामृत - प्रसंग १२१

रामनगर में केतकी नदी के तट पर, महन्त गणेश के आश्रम के बगल में, सुन्दरसाथ ने ठहरने के लिए एक अस्थायी भवन बनाया । श्री जी साहिब जी और सब सुन्दरसाथ वहीं पर रहने लगे और चर्चा होने लगी ।

श्री जी की चर्चा सुनकर सैंकड़ों लोग सुन्दरसाथ में शामिल हुए, जिनके नाम कहां तक लिखें । उनमें से कुछ ने श्रद्धाभाव से श्री जी एवं सुन्दरसाथ को घर पर भोजन भी करवाया ।

मुरलीधर वहीं से गुजर रहे थे, जब उन्होंने श्री जी की चर्चा सुनी । उनके अन्दर परमधाम की आत्मा थी और चर्चा सुनते ही उन्हें ईमान आ गया एवं श्री जी के स्वरूप की पहचान हो गई ।

हरिसिंह को सुजान शाह और सूरत सिंह के माध्यम से श्री जी के विषय में पता चला, तो वह उनका दर्शन करने आया । चर्चा सुनकर हरिसिंह को बहुत खुशी हुई और उसने श्री जी व सब सुन्दरसाथ को अगले दिन अपने घर पर भोजन के लिए आमन्त्रित किया ।

हरिसिंह ने अपने घर पर भोजन के लिए बहुत अच्छी व्यवस्था की । सुन्दरसाथ को पहले बिछौनों पर पधराया, फिर चौकी पर बैठाकर भोजन कराया और स्वयं धोती पहनकर सबको भोजन परोसता रहा । श्री जी के लिए ऊपर विशेष बैठक सजाई ।

हरिसिंह को श्री जी की ऊपरी पहचान थी, किन्तु उसने बहुत श्रद्धा भाव दिखाते हुए सबको अन्न, मिठाई, पकवान और अथानों का भोग लगाया । अन्त में सबको पान का बीड़ा परोसा गया ।

भोजनोपरान्त हरिसिंह श्री जी को अटारी पर एकान्त में ले गया और बहुत भाव से विनती करने लगा- "मैं आपका दास हूं । मैं किसी बात से बहुत दुःखी हूं । मुझ पर कृपा कीजिए कि यह विपत्ति टल जाए ।"

तब श्री जी ने हुक्म दिया- "तुम्हारा कार्य सिद्ध हो ।"

साक्षात् अक्षरातीत सामने विराजमान हों, तब भी उनसे आत्मिक लाभ लेना अंकुर पर निर्भर करता है । हरिसिंह का जितना अंकुर था, उसने उतना ही सुख लिया । सबको विदा करके जब वह दरबार गया, तो उस पर आने वाली विपत्ति टल गई ।

जब कुंवर किशोर सिंह ने यह बात सुनी, तब उसने और उसके महल में रहने वाले अनेक लोगों ने तारतम ले लिया, परन्तु उन सबको श्री जी की ऊपरी पहचान थी ।

किशोर सिंह ने भी हरिसिंह की भांति श्री जी को सब सुन्दरसाथ सहित बहुत आदर-सत्कार के साथ अपने महल में पधराकर रुचिकर भोजन करवाया और भली प्रकार से सबकी सेवा की । उसने भी अपनी निसबत के अनुसार सुख लिया ।

किशोर सिंह की एक दासी थी, जो प्रतिदिन श्री जी का दर्शन करने आती थी और हर बार भेंट करने के लिए कुछ सामान अवश्य लाती थी । उसे कुछ पहचान हो सकी ।

श्री जी का दर्शन करके सूरत सिंह ईमान ले आया और उसके मन में इस बात पर कोई संशय नहीं रहा कि श्री जी साक्षात् धाम धनी अक्षरातीत हैं । उसने तारतम ग्रहण कर लिया । अब उसके मन में व्याकुलता होने लगी कि यह बात किससे कहूं ?

तब वे दीवान देवकरण के पास गए और बोले- "मैंने एक बात सुनी है । मैंने परब्रह्म और उनकी आत्माओं को देखा है । तुम मेरे साथ चलो, मैं उनका दर्शन करवाता हूं । वे सब केतकी नदी के तट पर रहते हैं ।"

सूरत सिंह दीवान देवकरण को श्री जी के पास ले आए । श्री जी को देखकर देवकरण ने उनके चरणों में प्रणाम किया । श्री जी की चर्चा सुनकर उसके मन के संशय मिट गए । उसने सोचा कि यह बात छत्रसाल जी को बतानी चाहिए, वे अवश्य ईमान ले आएंगे ।

आशाराम नामक एक कबीरपंथी प्रतिदिन श्री जी की चर्चा सुनने आता था और बहुत श्रद्धा से चर्चा सुनता था । एक दिन उसने प्रसन्न होकर उत्सव का आयोजन किया और सबको भोजन करवाया । उसकी श्री जी से एक ही मांग थी कि वह सदैव श्री जी के चरणों में रहे ।

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