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औरंगज़ेब ने श्री प्राणनाथ के पीछे सेना भेजी

श्री प्राणनाथ लीलामृत - प्रसंग १२४

इस समय सुल्तान औरंगज़ेब ने पुरदल खान को हुक्म दिया- "रामनगर में वैरागियों का एक समूह रहता है । तुम उनके बारे में पता करो कि वे कौन हैं, कहां से आए हैं और इनका मकसद क्या है ?"

पुरदल खान ने शेख खिद्र को जांच करने के लिए भेज दिया । शेख खिद्र अपने सैनिकों के साथ शोर करता हुआ निकल पड़ा और उसने गढ़ा से ही रामनगर के राजा को सन्देश भेजा- "बादशाह के हुक्म से मैं वहां आ रहा हूं । फकीरों को पकड़कर मुझे दे दो या मुझसे युद्ध करो ।"

यह बात सुनकर राजा ने अपने कोतवाल से कहा- "तुम जाकर स्वामी कृष्णदास (श्री जी) को पूरी बात बताओ । हम बादशाह का दबदबा नहीं सह सकते, इसलिए उनका हुक्म टाल नहीं सकते । स्वामी जी से कहना कि चार दिन के लिए कहीं चले जाएं, फिर बाद में वापस अपने स्थान पर आ जाएं । यदि हमारे राज्य से बादशाह की सेना उन्हें पकड़ ले जाएगी, तो इससे हमारी बदनामी होगी ।"

कोतवाल से सन्देश मिलने पर श्री जी साहिब जी ने विनम्रता से उत्तर दिया- "हम बादशाह से नहीं डरते । हम तो राह देख रहे हैं कि वह किसी तरह हमारे पास आए । आप इस विषय पर ध्यान मत दो और अपने घर में बैठे रहो ।"

तब कोतवाल ने राजा को श्री जी की बात बताई । राजा ने उस कोतवाल को श्री जी के पास वही अर्ज लेकर दोबारा भेजा । पुनः श्री जी ने कोतवाल को वही उत्तर देकर लौटा दिया । श्री जी का उत्तर सुनकर राजा को बहुत अचरज हुआ कि इन्हें जरा भी डर नहीं लगता ।

तब राजा ने अपने मन्त्री सुवंशराय को श्री जी को समझाने के लिए भेजा । श्री जी ने मन्त्री को भरोसा दिलाने के लिए चर्चा करके अपने ज्ञान का बल दिखाया । तब उस मन्त्री ने राजा को सान्त्वना दी कि जब इतनी बार कहने पर भी वे लोग नहीं मानते, तो उन्हें अपने दिल के अनुसार कार्य करने दीजिए ।

दूसरे दिन शेख खिद्र रामनगर पहुंच गया और सीधे राजा से मिलकर बोला- "हमको बादशाह औरंगज़ेब का हुक्म है कि वैरागी को पकड़कर उनके हजूर में ले जाना है । यदि तुम उनकी रक्षा करना चाहते हो तो मुझसे युद्ध करो, या तुम स्वयं वैरागी को पकड़कर मेरे हवाले कर दो ।"

राजा ने उत्तर दिया- "हम सुल्तान का हुक्म सिर पर चढ़ाते हैं । हमें वैरागी से कुछ भी काम नहीं है । तुम जाकर उन्हें पकड़ लो और अपने स्थान पर ले जाओ ।"

शेख खिद्र अपनी हवेली में लौट गया और अपने दीवान भिखारी दास से सलाह करने लगा- "अब हमें क्या करना चाहिए ? उन्हें कैसे पकड़ा जाए ?"

भिखारी दास ने कहा- "आप पहले मुझे उनके पास भेजिए । मैं उनकी खबर लेता हूं । उनसे वाकिफ होने के बाद हम उन्हें पकड़ लेंगे ।"

भिखारी दास श्री जी साहिब जी के पास आया और चरणों में प्रणाम करके बोला- "बादशाह का फरमान आया है कि आपकी पूरी जानकारी ली जाए । हम आपको पकड़कर सुल्तान के पास ले जाने के लिए आए हैं ।"

हादी ने उत्तर दिया- "मैं तो यही चाहता हूं कि बादशाह मुझे याद करे और कोई मुझे उस तक पहुंचा दे । तुम मेरी हकीकत जान लो । मैं तुमको चर्चा सुनाता हूं, तुम सब कुछ समझ लो ।"

तब श्री जी ने उसे परमधाम की सब मूल बातें बता दीं । भागवत और कुरान के सवाल भी मिलाकर दिखा दिए । तीन दिन और तीन रात तक श्री जी उसे तारतम ज्ञान का वर्णन करते रहे । श्री जी ने सारे मतों के विरोध को समाप्त करके एक दीन का मार्ग बताया । तब भिखारी दास उन पर ईमान ले आया ।

भिखारी दास ने वापस लौटकर शेख खिद्र को सारी हकीकत कही- "मैंने जमाने के हादी को देखा है ।"

शेख खिद्र ने पूछा- "यह तुम कैसी बात कह रहे हो ? तुम्हें हादी की पहचान कैसे हुई ? मुझे हादी के आने के निशान बताओ ।"

तब भिखारी दास ने कुरान और भागवत के सभी प्रश्नों को मिलाकर और उनका उत्तर देकर उसके दिल को ज्ञान से प्रकाशित कर दिया । फिर उसने कयामत के जाहिर होने के सातों निशान का विस्तृत वर्णन किया, जैसे- दाभ-तुल-अर्ज जानवर का प्रकट होना, दज्जाल का शोर करना, आजूज-माजूज का आना, हजरत ईसा (श्री देवचन्द्र जी) का प्रकट होना, इस्राफील फरिश्ते का सूर फूंकना, मगरब से सूरज का उगना, इमाम (श्री जी साहिब जी) का जाहिर होना ।

भिखारी दास ने सबके मायने खोलकर बता दिए, सारे शक मिटा दिए और एक धर्म करके दिखा दिया । हकीकत और मारफत के सारे द्वार खोल दिए और हक को पाने की सरल राह भी दिखा दी ।

यह सब सुनकर शेख खिद्र की सुध गई और वह विचार करने लगा । भगवान दास के साथ सैय्यद अब्दुल रहमान और रघुनाथ भी गए थे । उन्होंने भी भिखारी दास की बातों की पुष्टि की, तब शेख खिद्र के मन का दज्जाल (संशय) भाग गया ।

उन तीनों ने शेख खिद्र से कहा- "आप वहीं चलिए, हम आपको उनका दीदार करवाते हैं । यदि आप उनकी हकीकत को समझेंगे, तो आप परवरदिगार को पा लेंगे ।"

शेख खिद्र उसी अवस्था में तुरन्त उठा, अपनी सवारी तैयार करी, और श्री जी को सूचना भिजवा दी- "हम आपका दीदार करने के लिए आ रहे हैं ।"

शेख खिद्र अपनी सेना के साथ श्री जी की हवेली में पहुंच गया । श्री जी का दर्शन करके वह उनके चरणों लगा । श्री जी ने उसके अन्दर परमधाम की आत्मा को पहचान लिया । पहले उसने श्री जी के मुख से कयामत की चर्चा सुनी, फिर सनंधे सुनीं । उसे हर तरह से हक (अक्षरातीत) के प्रकटीकरण की अनुभूति हुई ।

इस समय दज्जाल ने बहुत शोर किया । निकट के गांव में बेदड़े मुसलमान रहते थे । उन्हें लगा कि शेख खिद्र हिन्दू वैरागियों को पकड़ने आया है । यदि वे उसकी सहायता करेंगे, तो इस्लाम का काम होगा । अतः वे भी श्री जी की हवेली में पहुंच गए ।

जब उन्होंने वहां पर कुरान का अनुवाद पड़ा देखा, तो वे हिंसक हो गए और चिल्लाने लगे- "हिन्दुओं को मुहम्मद की चर्चा करने की इजाजत (अनुमति) नहीं है ।"

श्री जी के साथ बुरा व्यवहार होता देखकर शेख खिद्र को क्रोध आ गया और उसने आदेश दिया- "इन्हें उठाओ और धक्के देकर बाहर निकाल दो ।"

शेख खिद्र के सैनिकों ने उन गोदड़े मुसलमानों को अपमानित करके बैठक से बाहर निकाल दिया ।

शेख खिद्र अपने सभी साथियों के साथ ईमान ले आया और श्री जी के स्वरूप की पूरी पहचान करके वापस अपने डेरे में आ गया ।

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