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रामनगर के राजा की अश्रद्धा

श्री प्राणनाथ लीलामृत - प्रसंग १२५

दूसरे दिन शेख खिद्र रामनगर के राजा से मिलने गया और उसे धिक्कारते हुए बोला- "हे राजा ! बहुत अफसोस है कि यहां ऐसे पहलवान (महापुरुष) रहते हैं और तू कभी उनका दीदार करने नहीं गया । अब मैं तुझको क्या कहूं ? तुझे आज तक उनकी पहचान नहीं हुई ?"

तब राजा ने कहा- "अभी तो तुम उन्हें पकड़ने का शोर मचा रहे थे । भला हुआ जो तुम्हारे विचार बदल गए और तुम शान्ति की बात करने लगे ।"

शेख बोला- "पहले मुझे कुछ पता नहीं था । मुझे तो उन्हें पकड़ने का आदेश देकर भेजा गया था । जब मैंने जमाने के हादी को देखा, तब मुझे उनकी पहचान हुई और उन्होंने मेरे सारे शक भान (मिटा) दिए । अब मैं उनका गुलाम हूं । वे जो आदेश देंगे, सो सब मुझे करना है । मैं उनका दिया पैगाम बादशाह तक पहुंचाऊंगा ।"

शेख खिद्र के चले जाने का बाद लोगों ने राजा से कहा- "इनके पास भुरकी (अभिमन्त्रित भस्म) है, जो वैरागी अपने हाथ में रखते हैं । जो भी उनसे मिलने जाता है, उसके सिर पर भुरकी डाल देते हैं । फिर वह उनके वश में हो जाता है ।"

राजा कहता है- "शेख खिद्र के कारण मुझे जाना तो पड़ेगा, परन्तु मैं दूर से दर्शन करूंगा, उनके निकट नहीं बैठूंगा ।"

दूसरे दिन राजा ने श्री जी एवं सब सुन्दरसाथ को अपने यहां आमन्त्रित किया । राजा ने बाग में आकर सुन्दरसाथ का दर्शन किया । वह श्री जी के सम्मुख खड़ा रहा, बैठा नहीं, क्योंकि उसके दिल में डर था कि कहीं वे उसे वश में न कर लें । वह इसी प्रकार वहां से वापस लौट गया, उसने चर्चा भी नहीं सुनी । बिना अंकुर वह क्या कर सकता था ? श्री जी के अलौकिक स्वरूप की पहचान नहीं कर सका ।

इसके बाद शेख खिद्र ने श्री जी से विनती की- "आप जैसा हुक्म करोगे, मैं वैसा ही आपके बाबत हजूर को लिखकर भेज दूंगा ।"

हादी श्री जी साहिब जी ने कहा- "मैं तुमसे क्या कहूं ? तुम्हारी बुद्धि ने जैसा मुझे देखा है, वैसा ही लिखकर तुम पुरदल खान को पहुंचा दो, और वह सुल्तान को भेज देगा, जिससे उसे पहचान हो सके ।"

कुछ दिन शेख खिद्र वहीं रहा, फिर उसने श्री जी की पहचान लिखकर भेज दी । शेख के कई लोग श्री जी के चरणों में ही रह गए, जिनका ईमान (विश्वास) प्रबल था । भिखारी दास शेख खिद्र को विदा करके वापस श्री जी के चरणों में आ गए और अपने पूरे परिवार को भी ले आए । उन्होंने अपना सब कुछ श्री जी को समर्पित कर दिया ।

इसके बाद धमोनी से अहदी गुलाम मुहम्मद आया । वह पुरदल खान का रिश्तेदार था और उसने सुना था कि बादशाह वैरागी को पकड़ना चाहते हैं । बादशाह को खुश करने के लोभ में वह भागता आया और आने से पहले ही रामनगर के राजा को सन्देश भेज दिया कि वैरागी को पकड़कर हमें दे दो ।

तब राजा डर गया कि इन वैरागियों पर तो बादशाह का दबदबा है । हम इन्हें अपने राज्य में क्यों रखें ? इन्हें रखना अमंगल है ।

तब राजा ने अपने सेवकों के माध्यम से श्री जी को सन्देश भेजा- "आप हमारे देश से चले जाइए । हम रोज के झंझट नहीं सह सकते ।"

जब श्री जी ने देखा कि राजा के मन में डर और क्रोध भरा हुआ है, तो उस भूमि को विष के समान समझा और वहां से उठ चले ।

श्री जी दो वर्ष तक रामनगर में रहे और वि.सं. १७३९ में गढ़ा आ गए ।

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