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गढ़ा की बीतक

श्री प्राणनाथ लीलामृत - प्रसंग १२७

अब श्री जी उस बाग से चलकर गढ़ा पहुंच गए । भगवन्त राय का बेटा वहां का हाकिम (अधिकारी, शासक) था । उसके मन में सुन्दरसाथ को लूटने की इच्छा हुई और यह बात उसने अपने लोगों के सामने भी कही ।

गंगाराम बाजपेई वहीं रहते थे और दो बार श्री जी का दर्शन करने आ चुके थे ।

जब उन्होंने यह बात सुनी, तो उस हाकिम को मना किया- "तुम ऐसा काम क्यों करना चाहते हो ? यदि तुम वैरागियों को लूटोगे, तो बदनाम हो जाओगे । और ये ऐसे भी नहीं हैं कि कोई सरलता से उन्हें लूट ले । ये अपने बचाव में मरने-मारने को तैयार हो जाएंगे । तुम्हें भूलकर भी ऐसी बात नहीं करनी चाहिए ।"

उसी दिन से गढ़ा को लानत लगी और वह दुर्दशाग्रस्त हो गया । अब अन्तिम दिन तक उसका सुधार नहीं हो सकता ।

गढ़ा में ही बिरजू ने श्री जी को सूचना दी कि रामनगर के राजा ने उनकी हवेली की नींव खोदकर उसे पूरी तरह नष्ट करवा दिया है । यह बात सुनकर श्री जी को दुःख हुआ, जिसके कारण गढ़ा खराब हो गया और प्राकृतिक कोप में पूरी तरह नष्ट हो गया ।

गढ़ा में बहुत लोग तारतम लेकर सुन्दरसाथ में शामिल हुए, जिनके नाम कहां तक लिखें ।

इस समय लालदास को श्री जी का हुक्म हुआ कि सुल्तान औरंगज़ेब को पुनः पैगाम पहुंचाओ ।

जब देवकरण विदा ले रहे थे, तब श्री जी ने उनसे पूछा- "तुम अपना राज्य छोड़कर दूसरे राज्य में क्यों जा रहे हो ?"

तब देवकरण ने उत्तर दिया- "मैं किसी बात पर क्रोधित होकर यहां आ गया था, तब से वापस नहीं जा सका ।"

तब श्री जी ने कहा- "तुम इस कार्य के लिए ही आए थे कि मेरा सन्देश छत्रसाल जी तक पहुंचा सको । मैंने बहुत राजा देखे, परन्तु किसी में भी परमधाम का अंकुर नहीं देखा । छत्रसाल जी के अन्दर सकुण्डल की आत्मा है, इसलिए वे मेरी बात अवश्य सुनेंगे ।"

जब लालदास को हुक्म हुआ, तब उन्होंने कुरान के सोलहवें सिपारे में मूसा और हारून का किस्सा देखा ।

उसमें लिखा है कि मूसा पैगम्बर ने खुदा से अर्ज करी- "आपकी सहायता के बिना मैं फिरौन से कैसे लड़ सकता हूं ? मैं फकीर हूं और वह बादशाह है । मैं उस तक नहीं पहुंच सकता । यदि आप मुझे मेरा भाई दे दो, तो मैं मोमिनों को साथ लेकर फिरौन से लड़ सकता हूं ।"

तब खुदा ने मूसा पैगम्बर (श्री जी) को भाई के रूप में हारून (छत्रसाल) दिया । अब फिरौन (बादशाह औरंगज़ेब) का जोर नहीं चलेगा और वह किसी की हत्या नहीं कर सकेगा ।

लालदास ने श्री जी को यह आयत दिखाते हुए कहा- "हमें एक राजा चाहिए, जो खास मोमिन (परमधाम की आत्मा) हो ।"

इन बातों पर विचार चल रहा था, जिस कारण लालदास पैगाम लेकर नहीं गए । उनके स्थान पर चरणदास और गरीबदास ने औरंगज़ेब के अधिकारियों तक पैगाम पहुंचाया ।

धरमा बाई ने लालदास को बताया कि देवकरण ने छत्रसाल जी के सामने श्री जी के विषय में बात की है । यह सूचना लालदास ने श्री जी को दी । तब श्री जी ने देवकरण के पास सन्तदास और धर्मदास को पाती देकर भेजा, जिसमें छत्रसाल जी के लिए खास सन्देश था ।

फिर अगरिया से श्री जी ने लालदास, उत्तमदास, जीवनदास और गोविन्द दास को छत्रसाल जी के पास भेजा ।

गढ़ा में श्री जी ४३ दिन रहे ।

अगला प्रसंग- अमराई घाट पर श्री प्राणनाथ के चरण पड़े