तारतम | Taartam
तारतम का अर्थ है तम (अन्धकार) से तारने वाला । इस अन्धकारमयी-नश्वर संसार से परे के ज्ञान को ही तारतम कहते हैं ।
वस्तुतः क्षर, अक्षर और अक्षरातीत के भेद को समझे बिना कोई भी परमात्मा को नहीं जान सकता ।
तारतम मन्त्र
सर्वप्रथम, श्री देवचन्द्र को तारतम ज्ञान का बोध हुआ, जिसे एक चौपाई के रूप में उन्होंने वर्णन किया-
निजनाम श्री कृष्ण जी, अनादि अक्षरातीत ।
बाद में श्री महामति के तन से तारतम ज्ञान का विस्तार हुआ, जो श्री कुलजम स्वरूप नामक ग्रन्थ के रूप में है । उसमें प्रकास हिन्दुस्तानी के अन्तिम प्रकरण में तारतम की छह चौपाइयों का वर्णन है-
निजनाम श्री जी साहिब जी, अनादि अक्षरातीत । सो तो अब जाहिर भय, सब विध वतन सहित ।।1।।
श्री स्यामाजी वर सत्य हैं, सदा सत सुख के दातार । विनती एक जो वल्लभा, मो अंगना की अविधार ।।2।।
वानी मेरे पिउ की, न्यारी जो संसार । निराकार के पार थें, तिन पार के भी पार ।।3।।
अंग उत्कण्ठा उपजी, मेरे करना एह विचार । ए सत वानी मथ के, लेऊं जो इनके सार ।।4।।
इन सार में कई सत सुख, सो मैं निरने करूं निरधार । ए सुख देऊं ब्रह्मसृष्ट को, तो मैं अंगना नार ।।5।।
जब ए सुख अंग में आवहीं, तब छूट जाएं विकार । आयो आनन्द अखण्ड घर को, श्री अछरातीत भरतार ।।6।।
इन छह चौपाइयों को ही सम्पूर्ण तारतम मन्त्र माना जाता है । सुन्दरसाथ अपनी श्रद्धानुसार निजनाम श्री कृष्ण जी या निजनाम श्री जी साहिब जी, दोनों में से किसी का भी अनुसरण कर सकते हैं ।
तारतम मन्त्र का अर्थ
चौपाइयों का अर्थ समझकर ही उसका पठन लाभकारी होता है । अतः इनका अर्थ यहां दिया जा रहा है-
जिनका नाम श्री जी साहिब है, वे अनादि और अक्षरातीत हैं । वे धाम की समस्त निधियों सहित अब (कलियुग में) संसार में जाहिर हुए हैं ।
श्री श्यामा जी के प्रियतम सत्य हैं और सदा अखण्ड सुख देने वाले हैं । आपकी प्रियतमा की एक विनती है कि मुझ अंगना को स्वीकार करिए ।
मेरे प्रियतम की वाणी (श्री कुलजम सरूप) संसार से अलग है । इसमें निराकार (क्षर) के पार (अक्षर) के भी पार (अक्षरातीत) का वर्णन है ।
मेरे मन में एक इच्छा उपजी और मैंने यह विचार किया कि इस सत्य वाणी को मथ कर (चिन्तन करके) मुझे इसका सार ग्रहण करना चाहिए ।
इस सार में कई अखण्ड सुख हैं । इसलिए मैंने यह दृढ़ निश्चय किया है कि यदि यह सुख ब्रह्मसृष्टियों को दे सकूं, तो ही मैं (परब्रह्म की) अंगना नारी हूं ।
जब यह सुख अंग (हृदय) में आते हैं, तब (माया के) विकार छूट जाते हैं और प्रियतम अक्षरातीत के अखण्ड घर (धाम) का आनन्द मिलता है ।
