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अमराई घाट पर श्री प्राणनाथ के चरण पड़े

श्री प्राणनाथ लीलामृत - प्रसंग १२८

श्री जी साहिब जी का सन्देश छत्रसाल जी को देने के लिए देवकरण मऊ आए । उन्होंने छत्रसाल जी को श्री जी के स्वरूप का वास्तविक परिचय दिया ।

देवकरण ने आगे कहा- "औरंगज़ेब श्री जी से वैर रखता है क्योंकि वे धर्म की रक्षा के लिए लड़ रहे हैं । श्री जी सभी राजाओं से मिल चुके हैं । आपको भी उन्हें अपने यहां आमन्त्रित करना चाहिए ।"

छत्रसाल जी के अन्दर परमधाम का अंकुर था, इसलिए देवकरण की बात सुनते ही वे सावचेत हो गए । उन्होंने इस विषय में अपने चाचा बलदीवान से बात करी ।

इतने में लालदास और उत्तमदास वहां पहुंच गए । जब छत्रसाल जी ने लालदास जी से भागवत के श्लोक सुने जिसमें कलियुग में बुद्ध जी के आने की बात कही गई है, तो उनके मन में श्री जी के चरणों को पाने की इच्छा जागी ।

छत्रसाल जी ने देवकरण से कहा- "तुम स्वयं श्री जी साहिब जी को मेरी तरफ से बुलाने जाओ । अपने साथ लालदास जी और उत्तमदास जी को भी ले जाओ ।"

देवकरण वहां से विदा होकर अगरिया पहुंचे । उन्होंने श्री जी को छत्रसाल जी का निमन्त्रण देकर प्रसन्न किया और सबकी बहुत सेवा करी ।

श्री जी एवं सब सुन्दरसाथ अगरिया से चलकर पन्ना पहुंचे । वहां किलकिला नदी के तट पर अमराई घाट में परमहंसों ने डेरा किया । उन परमहंसों में सिरदार अक्षरातीत हैं, जिन्होंने उसे झंडे का स्थान (केन्द्र) बनाने का विचार चित्त में ले लिया । अपनी ठौर को देखकर श्री जी बहुत प्रसन्न हुए ।

इतनी बड़ी संख्या में सुन्दरसाथ को आया देखकर पन्ना में रहने वाले गौड़ लोग आपस में बात करते हैं- "लगता है कोई साधु-वैरागी आए हैं, हमें वहां जाकर देखना चाहिए ।"

उन सबने आकर सुन्दरसाथ का दर्शन किया और कहा- "हे साधुजन ! इस नदी का जल मत पीना क्योंकि यह विषैला है । इसको पीने से प्राण छूट जाएंगे ।"

तब सब सुन्दरसाथ ने मिलकर श्री जी के चरणों का अंगूठा धोकर चरणामृत नदी में डाल दिया । उसके चमत्कार से किलकिला नदी का जल विषमुक्त हो गया । इसके बाद पूरे समाज ने उसमें निस्संकोच स्नान किया ।

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