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श्री प्राणनाथ व छत्रसाल जी की भेंट

श्री प्राणनाथ लीलामृत - प्रसंग १२९

छत्रसाल जी को सूचना भेज दी गई कि श्री जी पन्ना पहुंच गए हैं ।

छत्रसाल जी ने उत्तर भिजवाया- "मेरा वहां आना नहीं हो पाएगा । आपसे प्रार्थना है कि महिलाओं को वहीं छोड़कर छड़े लोगों के साथ आप मऊ में पधारें । आपके आने से मेरे सब कार्य सिद्ध होएंगे और मुझे अनन्त सुख मिलेगा ।"

तब श्री बाई जी और महिला सुन्दरसाथ को वहीं छोड़कर, श्री जी पन्ना से मऊ जा पहुंचे । मऊ में तिंदुनी दरवाजे के पास श्री जी ने डेरा जमाया । छत्रसाल जी ने भेष बदलकर दूर से उनका दर्शन किया ।

फिर दूसरी बार छत्रसाल जी शिकारी का भेष बनाकर आए । जहां श्री जी सब सुन्दरसाथ के बीच बैठे थे, वहां जाकर वे मूढ़ की तरह खड़े हो गए ।

छत्रसाल जी बोले- "बाबा जू ! राम-राम !"

श्री जी ने उत्तर दिया- "बाबा ! यहां आकर बैठो ।"

छत्रसाल जी आकर बिछौने के किनारे पर दूर बैठ गए ।

श्री जी ने कहा- "बाबा ! और आगे आओ । मेरे सामने यहां बैठो ।"

छत्रसाल जी अपने स्थान से उठकर थोड़ा आगे आए ।

श्री जी ने कहा- "और आगे आओ । अब तो तुम फंद में पड़ चुके हो । अब भागकर कहां जाओगे ।"

तब छत्रसाल जी ने उत्तर दिया- "ब्रह्माण्ड में ऐसा कोई नहीं है, जो मुझ पर फंदा डाल सके । यह काम सिर्फ बुद्ध जी कर सकते हैं । मैं बारह वर्षों से उनका सेवक हूं ।"

तब श्री जी ने कहा- "आप उनकी छाप का सिक्का मुझसे लेकर देख सकते हैं ।"

यह कहकर श्री जी ने अपना आसन उठाया, तो नीचे बुद्ध जी की छाप वाले अनेक सिक्के पड़े थे । ये सिक्के वैसे ही थे, जैसा सिक्का छत्रसाल जी को स्वप्न में बुद्ध जी का दर्शन होने के बाद मिला था ।

इस घटना के बाद छत्रसाल जी वहां से उठकर अपने महल में चले गए और सबको आज बीती घटना के बारे में सुनाते हुए कहा- "परब्रह्म आए हैं । जिन्हें दर्शन करना हो, सो सब कीजिए ।"

उस समय मऊ में बड़ी रानी देवकुंवरी उपस्थित थीं । जब उन्होंने छत्रसाल जी के मुख से यह सुना, तो ब्राह्मणियों का भेष बनाकर उन्होंने श्री जी का दर्शन किया ।

इसके बाद समस्त महल वासियों के आगे आकर, चाचा बलदीवान के साथ, छत्रसाल जी ने अपने वास्तविक राजसी भेष में औपचारिक रूप से श्री जी से भेंट की ।

जब मऊ में श्री जी की छत्रसाल से भेंट हुई, उस समय अफगन खान ने मऊ पर चढ़ाई कर रखी थी । छत्रसाल की सेना भी तैयार थी ।

युद्ध से पहले छत्रसाल ने आकर श्री जी के चरणों में प्रणाम किया । श्री जी ने रूमाल लेकर छत्रसाल के सिर पर रख दिया, फिर अपना हाथ उनके सिर पर रखते हुए आशीर्वाद दिया कि उनके मनोरथ और कार्य पूर्ण हों ।

इस समय छत्रसाल जी के सैनिक कहने लगे- "यदि हम इस युद्ध में विजयी हुए, तो हम श्री जी को परब्रह्म मान लेंगे ।"

संसार के लोग तो चमत्कार की ही कामना करते हैं । छत्रसाल जी की सेना व संसाधन अफगन खान की तुलना में बहुत कम थे । उस युद्ध में उनकी हार तय थी । जब छत्रसाल जी चमत्कारिक ढंग से विजयी हुए, तब लोगों ने स्वीकार किया कि श्री जी के बिना यह कार्य असम्भव था ।

युद्ध से निवृत्त होकर छत्रसाल जी ने तारतम का पट (नक्शा) देखा, जिसमें क्षर, योगमाया और परमधाम का विस्तृत चित्रण है । उसे समझने के बाद उनकी आत्मा जाग्रत हो गई और उनसे सांसारिक व्यवहार छूटने लगा ।

कुछ दिनों के पश्चात् श्री जी मऊ से अमराई घाट लौट गए ।

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