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चौपड़ा हवेली में युगल स्वरूप को पधराया

श्री प्राणनाथ लीलामृत - प्रसंग १३०

श्री जी साहिब जी वि.सं. १७४० में पन्ना पधारे । जिस प्रकार के समर्पित भाव से छत्रसाल जी ने उनकी सेवा करी, उसका इस जिह्वा से वर्णन करना सम्भव नहीं है । जब से ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति हुई है, किसी ने भी ऐसी सेवा नहीं की है, न ही कोई कर सकेगा ।

जब छत्रसाल जी अमराई घाट पर श्री जी के पास आए, तो उन्होंने सब सुन्दरसाथ के सामने श्री जी के दोनों चरणों पर शीश रखकर दण्डवत प्रणाम किया । उन्होंने सांसारिक मर्यादा की परवाह नहीं की ।

श्री जी को सुखपाल (पालकी) में बैठाकर छत्रसाल जी स्वयं अपने कन्धे पर लेकर चलते हैं । अमराई घाट से चौपड़ा की हवेली पहुंचकर द्वार पर सुखपाल को रख देते हैं । छत्रसाल जी के मन में बहुत उमंग है और वे उस दिन को धन्य-धन्य मान रहे हैं ।

जैसे ही श्री जी हवेली के भीतर प्रवेश करने लगते हैं, मझली रानी दिल में अति प्रेम भरकर साड़ी का पांवड़ा कर देती हैं ।

तब छत्रसाल जी कहते हैं- "तू मुझसे आगे कैसे हो सकती है ?"

यह कहकर छत्रसाल जी साड़ी को उठा देते हैं और उसके स्थान पर अपनी पाग (पगड़ी) बिछा देते हैं । जब छत्रसाल जी द्वार से लेकर पलंग (सिंहासन) तक पाग बिछाने लगते हैं, तो वह थोड़ी कम पड़ जाती है ।

यह सब श्री जी की लीला थी, जिससे रानी का भाव भी पूरा हो जाए । तब मझली रानी वहां साड़ी बिछा देती हैं । श्री जी उस पांवड़े पर चलकर सिंहासन पर विराजमान हो जाते हैं ।

आरती उतारने से पहले, छत्रसाल जी ने अपने अहं सहित अपना सर्वस्व श्री जी के चरणों में न्यौछावर कर दिया ।

"श्री प्राणनाथ के चरण पर छत्ता बलि-बलि जाए ।"

छत्रसाल जी ने श्री बाई जी (तेज कुंवरी जी) को श्री जी के बगल में स्नेह से बैठाया । उन्हें इस युगल स्वरूप से ऐसा प्रेम हो गया, जो कहनी में नहीं आ सकता ।

समस्त सुन्दरसाथ के बीच में युगल स्वरूप को पधराकर छत्रसाल जी कहते हैं- "मैंने आपको पहचान लिया है, आप साक्षात् अक्षरातीत हैं । श्री ठकुराणी जी (श्यामा जी) को साथ लेकर आप मेरे घर पधारे हैं । जो भी आपको अक्षरातीत न मानकर कुछ और मानता है, वह ब्रह्मसृष्टि ही नहीं है । अब तो कुछ भी मेरा नहीं है, मैं अपना शीश दे चुका हूं । मुझ पर मेरा कोई अधिकार नहीं रहा । आप जैसा ठीक समझें, वैसी कृपा करें ।"

तब श्री जी बोले- "मैंने सभी राणा और बादशाह देखे, परन्तु परमधाम की आत्मा की जैसी रहनी होनी चाहिए, सो मैंने यहां देखी है ।"

छत्रसाल जी ने श्री प्राणनाथ की वन्दना में "पूर्णब्रह्म ब्रह्म से न्यारे, आनन्द अखण्ड अपार...." पद गाया और प्रेमपूर्वक युगल स्वरूप की आरती उतारी ।

गुरु ग्रन्थ साहिब में श्री जी और छत्रसाल जी के मिलन की भविष्यवाणी की गई है- "बीतेगा उनतालीसा दगेगा चालीसा, तब कोई होसी मरद मरद का चेला । नानक गुरु दिखावे सांई, होसी सच सच दी वेला ॥"

विजयाभिनन्द बुद्ध श्री प्राणनाथ जी ब्रह्मसृष्टियों के शिरोमणि हैं । उन्होंने छत्रसाल के समर्पण भाव से प्रसन्न होकर अपने हुक्म की शक्ति उन्हें दे दी । श्री जी ने गुरु ग्रन्थ साहिब में वर्णित उपरोक्त साखी बोली और फिर थाल लेकर छत्रसाल का तिलक किया तथा उन्हें "महाराज" बनने का आशीर्वाद दिया ।

छत्रसाल जी को महाराज घोषित किए जाने पर उनके लिए बधाई गाई जाने लगी । सब लोग उन्हें "महाराज जू" कहकर प्रणाम करने लगे ।

छत्रसाल जी राजा तो थे, परन्तु उनकी सेना तथा संसाधन सीमित थे । श्री जी ने उन्हें असीमित वैभव और विशाल साम्राज्य का स्वामी बनने का आशीर्वाद दे दिया ।

महाराज छत्रसाल के अन्दर विराजमान सकुण्डल की आत्मा को विशेष शोभा मिली और उनकी पहचान प्रकट हो गई । अब श्री जी की कृपा से महाराज छत्रसाल "छत्ता" बन गए और उनकी शक्ति का सामना करने का साहस किसी सुल्तान में भी नहीं रहा । श्री देवचन्द्र जी ने सकुण्डल के विषय में जो भविष्यवाणी की थी, वह सब सच हो गई ।

अब महाराज छत्रसाल ने श्री जी को विभिन्न प्रकार के मेवा, मिठाई तथा पकवानों का भोजन कराया । दोनों स्वरूपों के मिलन से सबको जो आनन्द मिला, उसका कोई परिमाण नहीं है ।

इसके पश्चात् कई बार महाराज छत्रसाल ने श्री जी को चौपड़ा हवेली में पधराया । श्री जी के सुखपाल को एक तरफ से महाराज छत्रसाल तथा दूसरी तरफ से मझली रानी खुशी-खुशी उठाते ।

वे बहुत प्यार से उन्हें अपने घर पधराते तथा भली-भांति से आभूषण पहनाकर बड़ा मनुहार करते । महाराज छत्रसाल ने श्री जी को तरह-तरह के आभूषण पहनाए और मझली रानी ने श्री बाई जी को अपने आभूषण पहनाए । अन्य सुन्दरसाथ ने भी यहां श्री जी की कई तरह से सेवा की, जिसका इस जिह्वा से वर्णन करना सम्भव नहीं है ।

महाराज छत्रसाल ने अपना तन-मन-धन श्री जी पर न्यौछावर कर दिया और उनके सामने हाथ जोड़कर खड़े हो गए । इसी लिए उनकी महिमा सबसे बड़ी है । उन्होंने श्री प्राणनाथ जी के स्वरूप की पूरी पहचान की और उन्हें धाम का धनी मानकर अटूट श्रद्धा से सेवा की ।

महाराज छत्रसाल ने छह माह में पन्ना में श्री जी के लिए एक अस्थायी भवन (बंगले) का निर्माण करवा दिया, जहां पर सब सुन्दरसाथ एकसाथ बैठकर चर्चा सुन सकें । श्री जी उसी भवन में रहने लगे । पन्ना में श्री जी का अधिक समय वहीं पर बीता और अधिकांश वाणी भी वहीं पर उतरी । बाद में छत्रसाल जी के पौत्र सभा सिंह ने "बंगला जी" का पक्का निर्माण करवाया ।

अगला प्रसंग- महाराज छत्रसाल को कतेब पक्ष से अवगत कराया