हिन्द केसरी महाराजा छत्रसाल | Maharaja Chhatrasaal
छत्रसाल जी का जन्म विक्रम सम्वत् 1706 में बुन्देलखण्ड (मध्य प्रदेश) की गुफाओं में हुआ था । उनके पिता का नाम चम्पत राय और माता का नाम लाल कुंवरी (सारन्धा) था । चम्पत दम्पति के पांच पुत्र थे- सारावाहन, अंगद राय, रतन शाह, छत्रसाल और गोपाल ।
माता-पिता का संघर्षमय जीवन
औरंगज़ेब ने चम्पत राय और सारन्धा की सहायता से ही दिल्ली का सिंहासन पाया था, किन्तु बाद में वह कपट पर उतर आया और उनके खिलाफ षड्यन्त्र करने लगा । बुन्देला वीर चम्पत राय प्रायः औरंगज़ेब की हिन्दुओं के दमन की नीति के विरुद्ध संघर्षरत रहते थे । छत्रसाल की माता भी एक वीरांगना थी । गर्भावस्था में भी उन्होंने आराम नहीं किया और अपने पति के साथ जंगलों में भटकती रहीं ।
एक बार मुगल सेना से चम्पत राय का घमासान युद्ध हुआ । इस युद्ध में उनका बड़ा पुत्र सारावाहन वीर गति को प्राप्त हुआ । चम्पत दम्पति विलाप करते-करते सो गए । स्वप्न में सारावाहन ने उनसे कहा कि मैं पुनः आऊंगा । इसके एक वर्ष पश्चात् ही छत्रसाल का जन्म हुआ ।
जब छत्रसाल गर्भ में थे, तब मुगल सेना ने उनके माता-पिता को घेर लिया । इस कठिनाई में भी चम्पत राय घबराए नहीं । उन्होंने लाल कुंवरी को अपनी पीठ पर बांधा और पहाड़ियों को फांदते हुए गायब हो गए । मुगल सेना उनका कुछ अहित न कर सकी । इस घटना के छह माह बाद विकट परिस्थितियों में मोर पहाड़ी पर छत्रसाल का जन्म हुआ ।
बाल्य जीवन
छत्रसाल का पालन-पोषण ननिहाल में उनके मामा वीर योद्धा साहब सिंह धंधेरा की देख-रेख में हुआ । युवा होने तक वे हथियार चलाने, घुड़सवारी और मलयुद्ध में प्रवीण हो गए । उन्होंने संस्कृत का भी अध्ययन किया ।
छत्रसाल की माता सारन्धा एक वीरांगना थी । एक युद्ध में औरंगज़ेब का सेनापति बहादुर खां घायल और बेहोश हो गया । उसका बहादुर घोड़ा उसकी रक्षा कर रहा था । घोड़ा बहुत सुन्दर और शक्तिशाली था । चम्पत राय की सेना का कोई वीर उसे पकड़ नहीं पा रहा था । तब रानी सारन्धा ने साहस करके उस घोड़े को पकड़ लिया और कूद कर उसकी पीठ पर सवार हो गई । रानी की जय जयकार हुई ।
एक दिन छत्रसाल उसी घोड़े पर बैठकर नगर से बाहर सैर पर निकल गए । बहादुर खां घात लगाए बैठा था । अवसर पाते ही उसने बालक छत्रसाल से वह घोड़ा छीन लिया । जब यह बात रानी सारन्धा को पता चली, तो वह अपने सैनिकों की टुकड़ी लेकर शाही दरबार में पहुंच गई और बहादुर खां को ललकारा । दोनों तरफ तलवारें खिच गयीं । औरंगज़ेब ने कहा, रानी साहिबा यह घोड़ा आपको महंगा पड़ेगा । बादशाह ने प्रलोभन भी दिया, परन्तु रानी सारन्धा ने सब कुछ ठुकरा दिया और घोड़ा छीनकर वापस लौट आयीं ।
माता-पिता की मृत्यु
कुछ समय पश्चात्, औरंगज़ेब की सेना और चम्पत राय में युद्ध छिड़ गया । इस घमासान युद्ध में धंधेरों के विश्वासघात के कारण चम्पत दम्पति अलग-थलग पड़ गए । जब बचने का कोई मार्ग न दिखा, तो जीवित मुगलों के हाथ न पड़ने के लिए, पति-पत्नी ने एक-दूसरे को तलवार से मारकर अपना प्राणान्त कर लिया और अपने सम्मान की रक्षा की ।
युवा जीवन
छत्रसाल का व्यक्तित्व तेजस्वी, विशाल, संवेदनशील और प्रतिभाशाली था । उनकी भुजाएं लम्बी, नयन विशाल, छाती चौड़ी और हृदय उदार था । वह मृदुभाषी वीर पुरुष थे । उन्हें कविता लिखने का भी शौक था ।
मुगलों से लोहा लेने के लिए उनकी युद्ध कला को सीखना जरूरी था, इसलिए छत्रसाल जी मुगल सेना में भर्ती हो गए । वहां उन्होंने मुगलों की युद्ध कला और रणनीति सीखी । बहादुर खां के नेतृत्व में छत्रसाल जी ने देवगढ़ के किले पर चढ़ाई की और विजय प्राप्त की । विजय के उपलक्ष्य में औरंगज़ेब ने बहादुर खां को दिल्ली बुलाया । छत्रसाल जी को सम्मानित करने के बहाने बहादुर खां उन्हें भी दिल्ली ले गया और वहां छल से बन्दी बनाने का प्रयास किया । छत्रसाल जी दरबार से भाग निकले ।
छत्रपति शिवाजी से भेंट
छत्रसाल जी किसी प्रकार छत्रपति शिवाजी के पास पहुंच गए । मुगलों से संघर्ष करने वाले एक साहसी क्षत्रिय को देखकर शिवाजी को बहुत प्रसन्नता हुई । शिवाजी ने उनका उत्साह वर्धन किया और उन्हें बुद्धिमत्ता से छापामार युद्ध शैली से (छिप कर) औरंगज़ेब से लड़ने की सलाह दी ।
सेना व राज्य का गठन
विक्रम सम्वत् 1728 में छत्रसाल जी ने 5 घुड़सवार और 25 पैदल सैनिकों की एक टुकड़ी बनाई । अपने चाचा बलदीवान के साथ मिलकर उन्होंने सबसे पहले धंधेरों पर हमला किया क्योंकि उनके विश्वासघात के कारण ही छत्रसाल जी के माता-पिता का जीवन समाप्त हुआ था ।
इसके पश्चात् धंधेरों ने छत्रसाल जी को अपनी कन्या देकर सम्बन्ध बना लिया । अब धंधेरा योद्धाओं की सहायता से छत्रसाल जी ने औरंगज़ेब को चुनौती दी । उनका मराठों से भी मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध था । इसलिए औरंगज़ेब की सेना से छत्रसाल जी का संघर्ष प्रायः होता ही रहता था ।
उत्तम चरित्र
छत्रसाल जी के उत्तम चरित्र का एक उदाहरण इस घटना से मिलता है । एक बार एक अत्यन्त सुन्दर स्त्री उनसे मिलने आई और उनसे विवाह का प्रस्ताव रखा । छत्रसाल जी पहले से विवाहित थे, सो उन्होंने मना कर दिया । जब वह स्त्री हठ करने लगी, तो उन्होंने उससे इसका कारण पूछा । स्त्री ने कहा कि वह छत्रसाल जैसा वीर पुत्र चाहती है । तब छत्रसाल जी ने तुरन्त उत्तर दिया कि आप आज से मुझे ही अपना पुत्र समझिए ।
श्री प्राणनाथ के चरणों में समर्पण
विक्रम सम्वत् 1740 में श्री प्राणनाथ व हजारों सुन्दरसाथ पन्ना पधारे । यह वही परब्रह्म स्वरूप था, जिन्होंने छत्रसाल जी को स्वप्न में दर्शन देकर एक मोहर दी थी । छत्रसाल जी सदैव उस मोहर को अपने गले के हार में पहनते थे । जब छत्रसाल शिकारी का भेष बनाकर श्री प्राणनाथ से मिलने आए, तो प्राणनाथ जी ने अपने आसन के नीचे वैसी ही अनेक मोहरें दिखा दीं । यह देखकर छत्रसाल जी को विश्वास हो गया कि उनके घर में कोई महापुरुष नहीं, साक्षात् परब्रह्म पधारे हैं । श्री प्राणनाथ की जीवन लीला बीतक एवं प्राणनाथ लीलामृत से पढ़ी जा सकती है ।
छत्रसाल जी ने पन्ना की चौपड़ा हवेली में युगल स्वरूप को पधराया । उन्होंने अपना तन, मन, धन श्री प्राणनाथ के चरणों में अर्पित कर दिया । श्री प्राणनाथ ने बताया कि छत्रसाल के अन्दर परमधाम की साकुण्डल की आत्मा है । महाराजा छत्रसाल की सेवा भावना से प्रभावित होकर श्री प्राणनाथ ने उन्हें धर्मवीर अथवा अमीरुल मोमिन की उपाधि दी ।
श्री प्राणनाथ ने बंगला जी दरबार में सब सुन्दरसाथ की उपस्थिति में छत्रसाल जी को "महाराजा" घोषित कर दिया । श्री प्राणनाथ ने महाराजा छत्रसाल को विजय का वरदान दे दिया । महाराजा छत्रसाल ने 252 युद्ध लड़े, जिसमें से 52 बड़े युद्ध थे । श्री प्राणनाथ की कृपा से वे सभी युद्धों में विजयी हुए । उनकी विजय गाथा का चित्रण इस पद में किया गया है- छत्ता तेरे राज में, धक धक धरती होय । जित जित घोड़ा पग धरे, तित तित फतह होय ।।
छत्रसाल जी ने 11 वर्षों तक श्री प्राणनाथ व समस्त सुन्दरसाथ की बहुत सेवा करी । विक्रम सम्वत् 1751 में जब श्री प्राणनाथ पन्ना में समाधिस्थ हुए, तो महाराजा छत्रसाल को मऊ में बैठे-बैठे व्याकुलता होने लगी । वह तुरन्त पन्ना के लिए निकल पड़े । उस समय वर्षा ऋतु चल रही थी और केन नदी में उफान आया हुआ था । अपने प्राणों की परवाह किए बिना छत्रसाल जी अपने घोड़े भले भाई के साथ नदी में कूद पड़े । किसी प्रकार वे पन्ना पहुंच गए ।
पन्ना में जब छत्रसाल जी ने देखा कि श्री प्राणनाथ समाधिस्थ हो चुके हैं, तो उन्होंने अपनी तलवार निकाली और अपने पेट में घोंपने लगे । तभी श्री प्राणनाथ उठ पड़े और उन्हें ऐसा करने से रोक लिया । श्री प्राणनाथ ने उन्हे समझाया कि धर्म के शेष कार्यों का दायित्व उन्हें सम्भालना होगा । फिर उन्होंने अपनी पीठ दिखाई, जिस पर घोड़े के पदचिन्ह थे । श्री प्राणनाथ ने बताया कि कैसे उन्होंने छत्रसाल को नदी में डूबने से बचाया । उन्होंने आश्वासन दिया कि वे आगे भी इसी प्रकार अप्रत्यक्ष रूप से छत्रसाल के साथ रहेंगे । श्री प्राणनाथ के समाधिस्थ होने के बाद छत्रसाल जी ने धर्म के प्रचार-प्रसार का जिम्मा सम्भाला ।
विशाल राज्य व कुशल शासन
महाराजा छत्रसाल के राज्य की सीमा दर्शाने के लिए एक दोहा प्रसिद्ध है- इत जमुना उत नरबदा, इत चम्बल उत टौंस । छत्रसाल सौं लरन की, रही न काहू हौंस ।।
महाराजा छत्रसाल ने बुन्देलखण्ड में धर्म निरपेक्ष राज्य स्थापित किया । सारे देश में उर्दू-फारसी का बोल-बाला था, परन्तु छत्रसाल जी का राज-काज हिन्दी में ही होता था । उनके राज्य में स्त्रियों के सम्मान और नारी शिक्षा की ओर ध्यान दिया जाता था । छत्रसाल जी की धर्मपरायणता, विनम्रता और शासन कुशलता को देखकर छत्रपति शिवाजी के महाकवि भूषण को कहना पड़ा- सिवा को सराहों के सराहों छत्रसाल को । साहु को सराहों के सराहों छत्रसाल को ।
विक्रम सम्वत् 1788 में छत्रसाल जी के लौकिक जीवन का समापन हुआ ।
