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महाराज छत्रसाल को कतेब पक्ष से अवगत कराया

श्री प्राणनाथ लीलामृत - प्रसंग १३१

श्री जी साहिब जी ने अब तक महाराज छत्रसाल से कुरान की बातें छिपा कर रखी थीं, क्योंकि पहले उन्हें पहचान कराना और अक्षरातीत का प्रताप दिखाना जरूरी था ।

एक दिन श्री जी बंगले में बैठे थे । लालदास उनके सम्मुख कुरान पढ़ रहे थे और श्री जी उसकी व्याख्या करते जा रहे थे । दो-चार सुन्दरसाथ बैठे सब कुछ सुन रहे थे ।

तभी वहां महाराज छत्रसाल आ गए । वे दूर बैठकर सोचने लगे कि आज श्री जी इस प्रकार एकान्त में क्यों बैठे हैं ? फिर उन्होंने लालदास को बुलाकर पूछा- "आप गुप्त रूप से क्या पढ़ रहे हैं ? मुझे भी बताइए ।"

तब लालदास ने उत्तर दिया- "मुझे हुक्म नहीं है । मैं श्री जी से पूछकर आता हूं, तब आपको बताऊंगा ।"

लालदास ने जाकर श्री जी से अनुमति मांगी, तब श्री जी ने महाराज छत्रसाल को अपने पास बुलाकर कहा- "मैंने आज तक तुमसे कुरान की बातें छिपाकर रखी थीं, सो अब मैं कहता हूं । कुरान में सब अपनी बात है । मुहम्मद साहिब हमारे लिए ही कुरान लेकर आए थे । इसमें अपनी सब बीतक है । श्री देवचन्द्र जी, मेरा, तुम्हारा नाम है और आज दिन तक हम तीनों के साथ जो कुछ बीता है, वह सब इसमें लिखा है ।"

यह बात सुनकर महाराज छत्रसाल को बहुत जोश आ गया और वे बोले- "यह बात जाहिर करके मैं संसार में शोर (प्रचारित) कर दूंगा । यह हमारे घर की बात है, फिर हम इसे क्यों छिपाएं ? मुसलमान हमारा क्या कर लेंगे, मैं उन सबको आपके चरणों तले ले आऊंगा । अब आपके हुक्म तले मैं शहंशाह को युद्ध की चुनौती दूंगा । अब हक (अक्षरातीत), हादी (श्यामा जी) और मोमिनों (सुन्दरसाथ) के अतिरिक्त अन्य को कोई नहीं देखेगा । मेरी एक और बात सुनिए । जो मेरी इस बात को सुनकर ईमान लाएगा, उस पर छत्रसाल का तन, मन, धन न्यौछावर है ।"

महाराज छत्रसाल की यह बात सुनकर श्री जी बहुत प्रसन्न हुए । श्री जी ने उन्हें कुरान के गुह्य रहस्य बताए, और जो ग्रन्थ हाल में श्री जी को उतरा था, वह उन्हें भेंट किया ।

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