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महोबा के काज़ी की चुनौती

श्री प्राणनाथ लीलामृत - प्रसंग १३२

श्री जी और छत्रसाल जी के मिलन से कलियुग रूपी दज्जाल कांपने लगा और उसने बहुत शोर किया । उसे यह विश्वास हो गया था कि इन दोनों के आगे उसका जोर नहीं चलेगा और ये उसे मार डालेंगे ।

तब किसी-किसी के दिल में कलियुग बैठ गया । राजपरिवार के सबसे वरिष्ठ व्यक्ति के मन में श्री जी के प्रति वैर भावना पैदा हो गई । दज्जाल ने ऐसे लोगों के माध्यम से छत्रसाल जी को ईमान से डिगाने का बहुत प्रयास किया, परन्तु छत्रसाल जी श्री जी के प्रति कभी खिन्न नहीं हुए, सदैव खुश रहे ।

राजपरिवार में कुछ लोगों को यह बात रास नहीं आई कि ये लोग हिन्दू होते हुए भी कुरान पढ़ते हैं । उन्होंने इसकी परख करने का निश्चय किया । तब चाचा बलदीवान ने काज़ी-मुल्ला और पण्डित बुलवाए, जिससे श्री जी की बात की सच्चाई परखी जा सके ।

महोबा से अब्दुल रसूल नाम का काज़ी आया । उसके साथ कुरान की चर्चा हुई । श्री जी ने उससे कुरान का एक ही प्रश्न पुछवाया और साथ ही यह शर्त रखी कि इसका एक ही उत्तर देना होगा, अनेक नहीं ।

काज़ी बोला- "मेरे आगे कोई कुरान की दम भी नहीं मार सकता । तुम लोग तो उमी (अनपढ़) की तरह पूछते हो । मुझे तमाम (पूरी) कुरान और तफ्सीर (अर्थ) याद रहते हैं । मुझसे पढ़कर कई लोगों ने अपनी मुराद पूरी की है ।"

लालदास ने कहा- "इसीलिए हम आपसे डरते हैं । आप क्रोध मत करना । मैं सवाल पूछता हूं, उसका जवाब दीजिए । कुरान में दुनिया की पैदाइश कितनी तरह की लिखी है ? समझकर जवाब देना, यह कुरान की बड़ी बात है ।"

काज़ी बोला- "हम कुरान के खिलाफ क्यों बोलेंगे ? कुरान पढ़ते हुए मैं बूढ़ा हो गया । मेरा दिल साफ है । अगर मैं कुरान से अलग कोई बात कहूं, तो तुम्हारे आगे हार मान लूंगा । अल्लाह कलाम (कुरान) में पांच तरह की पैदाइश लिखी है । तमाम खलक पढ़ती है, लेकिन किसी को इसकी खबर नहीं है ।"

लालदास ने काज़ी के आगे कुरान रख दी और उत्तर खोजने को कहा । काज़ी आयत नहीं ढूंढ सका ।

तब लालदास ने तिलकर्रसूल सिपारा दिखाया, जिसमें इसका वर्णन है- कुंन से पैदा होने वाली आम खलक (जीव सृष्टि), एक हाथ की पैदाइश (रसूल मुहम्मद पर ईमान लाने वाले), दो हाथ की पैदाइश (श्री देवचन्द्र जी और श्री जी साहिब जी पर ईमान लाने वाले), इप्तदाए की जमात (ब्रह्मसृष्टि), और खिलकत की जमात (ईश्वरी सृष्टि) । यह पांच तरह की पैदाइश हैं ।

इसके बाद लालदास ने काज़ी अब्दुल रसूल से पूछा- "आप इनमें से किस श्रेणी में हैं ? कृपया सच बोलना कि आपकी पैदाइश कौन सी है ?"

यह सुनकर काज़ी के दिल में घबराहट होने लगी । जब उसे उत्तर नहीं आया, तो वह इधर-उधर की बात करने लगा ।

तब बलदीवान ने कहा- "ऐ मियां ! तुम सवाल को भूलकर अलग बात कर रहे हो ।"

इस प्रकार कुरान के अनेक प्रसंगों पर चर्चा हुई ।

अन्त में काज़ी ने श्री जी साहिब जी के चरण पकड़कर सिजदा (प्रणाम) किया और बोला- "मैंने आपको तहकीक (निश्चित रूप से) पहचान लिया है । यह बहुत बुजरक (बड़ी) बात है ।"

तब बलदीवान ने काज़ी से पूछा- "आप सिर पर कुरान रखकर सच्ची बात बताओ ।"

काज़ी ने कुरान सिर पर रखकर कहा- "अगर मैं झूठ बोलूं, तो यह कुरान ही मुझे मार डाले । यह तहकीक जमाने का खाविन्द (मालिक) है । फरदा रोज कयामत में आने की जो सरत (वादा) करी थी, वह पूरी हो गई ।"

तब बलदीवान के मन में कुछ विश्वास जागा ।

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