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महाराज छत्रसाल की सेवा भावना

श्री प्राणनाथ लीलामृत - प्रसंग १३४

पन्ना में श्री जी साहिब जी के साथ ५००० सुन्दरसाथ थे । महाराज छत्रसाल के राज परिवार में एक और बात का संशय था कि इतने लोगों के भोजन-वस्त्र का खर्च कैसे चलता है ? राजकोष से तो कोई धन पहुंचता नहीं था ।

महाराज छत्रसाल के अतिरिक्त सबके मन में यह धोखा हो गया कि अवश्य श्री जी के पास कोई रसायन है, जिससे लोहे से सोना बना लेते हैं । श्री जी को पन्ना में रहते हुए तीन वर्ष बीत गए थे, परन्तु अब तक उनके धन के स्त्रोत की जानकारी राजपरिवार को नहीं थी ।

तब एक दिन महाराज छत्रसाल ने श्री जी से पूछा- "सबके मन में यह संशय है कि इतना खर्च कैसे चलता है ?"

तब श्री जी ने कहा- "यह खर्च सुन्दरसाथ से आता है । मेड़ता के राजा राम धन भेजते हैं ।"

यह सुनकर महाराज छत्रसाल का मन बहुत दुःखी हो गया । वे सोचने लगे कि अभी तक मैं ब्रह्मसृष्टि कहलाने के योग्य नहीं हुआ हूं । उन्हें लगा कि अभी तक उन्होंने धर्म का कोई कार्य किया ही नहीं है ।

महाराज छत्रसाल सोचने लगे कि यह बात किससे कहें ? वे दुःखी मन से प्रातःकाल ही अपने घर जाकर लेट गए । दोपहर के भोजन का समय हुआ । जब रानी उन्हें उठा नहीं सकी, तो चाचा बलदीवान को बाहर से बुलवाया ।

चाचा बलदीवान ने महाराज छत्रसाल को जगाकर कहा- "तुम किसलिए दुःखी हो ? वह बात मुझसे कहो ।"

महाराज छत्रसाल ने कहा- "वह कहने की बात नहीं है ।"

चाचा बलदीवान ने जोर देकर कहा- "तुम्हें वह बात मुझे बतानी पड़ेगी ।"

तब महाराज छत्रसाल ने कहा- "हमारे मन में यह विचार था कि श्री जी के पास कोई रसायन है, जिससे सुन्दरसाथ का खर्च चलता है । आज मैंने पता कर लिया कि यह खर्च सुन्दरसाथ में से आता है । यह सुनकर मुझे पीड़ा हो रही है । मैं कैसा उनका सेवक हूं ? मुझसे ऐसा गजब कैसे हो गया ?"

बलदीवान बोले- "यह बात सरल है । तुम अन्य राज्यों पर आक्रमण करके उन्हें विवश करो कि वे तुम्हें शुल्क दें । उससे तुम सुन्दरसाथ की सेवा कर सकते हो ।"

महाराज छत्रसाल ने दरबार में इस विचार पर सबकी सहमति लेकर लिखवा लिया ।

तब सुन्दरसाथ के बीच आकर उन्होंने श्री जी से अर्ज करी- "जो सुन्दरसाथ दूसरे राज्य से आते हैं और जो यहां रहते हैं, मैं उन सबकी नित्य सेवा करना चाहता हूं । इसके लिए मैं दूसरे राज्यों पर आक्रमण करना चाहता हूं । मैंने सहयोगी ठाकुरों से मिलकर इस पर सहमति बना ली है । मैं चाहता हूं कि इस अभियान में आप हाथी पर सवार होकर आगे चलें और मैं सेना के साथ सावधानीपूर्वक पीछे-पीछे चलूंगा ।"

श्री जी ने उनकी अर्ज स्वीकार कर ली ।

वि.सं. १७४३ में महाराज छत्रसाल के आग्रह पर श्री जी साहिब जी हाथी पर सवार होकर सेना के साथ चले । वे राठ, खड़ोत, जलालपुर होते हुए कालपी के निकट पहुंच गए ।

कालपी में सभी मुल्ला, काज़ी, सैय्यद को जमा करके उनके साथ कुरान-हदीसों पर चर्चा हुई ।

वे सभी श्री जी से पराजित हुए और उन्होंने महज़रनामा (प्रमाणपत्र) दे दिया, जिसमें लिखा था- "हमने यह तहकीक कर लिया है कि यही जमाने के खाविन्द हैं । जो कुरान-हदीसों में लिखा है, उसे आज हमने अपनी आंखों से सच होते देख लिया ।"

श्री जी के आदेश पर महज़रनामा और कयामत के सातों निशान वाली पाती सुल्तान औरंगज़ेब तक पहुंचा दी गई । उसे सुनकर सुल्तान ने अपना सिर नीचा कर लिया, परन्तु अपने अभिमान को नहीं छोड़ सका । जिनके दोनों कानों पर मुहर (ताला) हो, वे ईमान कैसे ला सकते हैं ?

कालपी से श्री जी संग महाराज छत्रसाल व उनकी सेना सिंउड़ा पहुंचे । तब चित्रकूट के राजा बसन्त सुरखी ने आकर श्री जी के चरणों में प्रणाम किया । बसन्त सुरखी ने श्री जी को अपने महल में पधराकर उनकी सेवा करने की इच्छा प्रकट की ।

बसन्त सुरखी के निवेदन पर श्री जी चित्रकूट चले गए । राजा ने उन्हें बुला तो लिया, परन्तु श्रद्धा के अभाव में वह स्वयं सेवा से दूर रहा । परिणाम स्वरूप, परब्रह्म के पधारने पर भी वह लाभ नहीं ले सका और संसार की लहर में डूबा रहा ।

जब श्री जी चित्रकूट गए, तब महाराज छत्रसाल के मन में आया कि श्री जी के दूर चले जाने से उनकी सेवा भंग हो जाएगी । अतः सेवा की भावना से महाराज छत्रसाल ने सब सुन्दरसाथ, अपने कुंवर और रानियों सहित पूरे परिवार को चित्रकूट भेज दिया ।

श्री जी एक वर्ष तक चित्रकूट में रहे । वहां उन्हें "बड़ा कयामतनामा" की वाणी उतरी, जिसके माध्यम से धाम धनी ने कुरान के गुह्य रहस्यों को खोला है ।

महाराज छत्रसाल की सेवा से रीझकर धाम धनी श्री राज ने बड़ा कयामतनामा की शोभा उन्हें दी है, इसलिए उस पर "छत्ता" की छाप है । श्री जी ने इस बात की सूचना महाराज छत्रसाल को भिजवा दी, जिससे श्री राज की मेहेर सुनकर वे भी प्रसन्न हो जाएं ।

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