महाराज छत्रसाल को विजय का वरदान
श्री प्राणनाथ लीलामृत - प्रसंग १३६
श्री जी के नेतृत्व में महाराज छत्रसाल ने वि.सं. १७४३ में पूरे बुन्देलखण्ड में विजय अभियान चलाकर सभी राज्यों पर अपना अधिपत्य स्थापित कर लिया । फिर भी विद्रोहियों और यवन सेनाओं से उनका सामना होता ही रहता था ।
जब महाराज छत्रसाल ललितपुर पर आक्रमण करने जा रहे थे, तब मार्ग में पुरदल खान से भेंट हो गई । महाराज छत्रसाल के २२ घुड़सवारों ने उसकी ३००० की सेना को मार डाला । तब पुरदल खान अपमानित और तेजहीन होकर भेड़ की तरह वहां से भाग गया ।
अगली बार पुरदल खान बड़ी फौज लेकर आया और उसने गौर राजा को भी अपने साथ मिला लिया । महाराज छत्रसाल से उसका भीषण युद्ध हुआ । पुरदल खान की फौज का नामो निशान मिट गया । अब महाराज छत्रसाल से जीत पाने की उसे कोई आशा नहीं रही ।
जैसे मूसा पैगम्बर की दुआ (प्रार्थना) पर फिरौन बादशाह नील नदी में गर्क हो गया, वैसे ही हक श्री जी साहिब जी का फरमान (आदेश) न मानने के कारण औरंगज़ेब का साम्राज्य नष्ट हो गया ।
ओड़छा के राजा ने महाराज छत्रसाल के प्रान्त में खटोला नगर पर कब्जा कर लिया । उसकी धृष्टता के कारण उसे ऐसी फटकार लगी कि उसकी मृत्यु हो गई ।
जब श्री जी चित्रकूट से वापस पन्ना लौट रहे थे, तब मिट्ठू पीरजादा ने श्री जी पर बुरी नजर करी । वह ५००० घुड़सवारों की सेना लेकर आक्रमण करने के लिए आ रहा था । मार्ग में चमारों ने उसकी सेना को नष्ट कर दिया । मिट्ठू पीरजादा काला मुंह लेकर (अपमानित होकर) वापस लौट गया । उसे सब लोगों से लानत (धिक्कार) मिली और उसके सारे अधिकार भी छिन गए ।
इस प्रकार जिस-जिस ने श्री जी या महाराज छत्रसाल पर बुरी दृष्टि करी, उसे तत्काल सजा मिली । कुरान में ऐसे लोगों को ही काफिर लिखा है और इनके भाग्य में दण्ड भी लिखा है ।
फिर जैतपुर के राजा ने महाराज छत्रसाल पर आक्रमण किया । उस पर पूरी लानत (धिक्कार) उतरी और उसका विनाश हो गया ।
ओड़छा के सेनापति दौआ ने पुनः खटोला पर आक्रमण कर दिया । वह महाराज छत्रसाल से बुरी तरह पराजित हुआ और अपमानित होकर लौट गया ।
जब बादशाह औरंगज़ेब तक सूचना पहुंची कि महाराज छत्रसाल ने उसके राज्य के अनेक प्रान्तों पर कब्जा कर लिया है । यह सुनकर बादशाह ने रणमस्त खान को अति विशाल सेना के साथ महाराज छत्रसाल पर आक्रमण करने के लिए भेज दिया ।
रणमस्त खान के चले जाने के बाद, औरंगज़ेब को (स्वप्न में) रसूल मुहम्मद का संकेत मिला कि छत्रसाल से युद्ध करना उसके हित में नहीं है । उस समय सारी बातों पर विचार करके शहंशाह ने रणमस्त खान को सन्देश भेजकर उसकी स्थिति पूछी । रणमस्त खान अपनी सेना के साथ सात मंजिल पार कर चुका था । औरंगज़ेब ने परवाना (आज्ञा पत्र) भेजकर उसे वहीं से वापस बुला लिया ।
ओड़छा के मंत्री पण्डित ने महाराज छत्रसाल पर चढ़ाई कर दी । तब महाराज छत्रसाल ने जवाबी कार्यवाही करते हुए ओड़छा राज्य पर जोरदार आक्रमण किया और कोई भी उसके विनाश को रोक नहीं सका ।
इसके बाद राणा प्रताप सिंह ने महाराज छत्रसाल पर बुरी नजर करी । वे लोग आपस में लड़कर नष्ट हो गए ।
इसे कयामत की फजर (प्रातः) कहते हैं । जिस-जिस ने जैसे पाप कर्म किए, उसे तुरन्त उसकी वैसी ही सजा मिली । जब श्री जी और महाराज छत्रसाल ने दज्जाल को बार-बार परास्त किया, तो मरते समय उसने बहुत हाथ पटका (शोर मचाया) । संसार के जो लोग उसके जाल में फंसे, उन सबका विनाश हो गया ।
महाराज छत्रसाल ने २५२ युद्ध लड़े, जिसमें से ५२ बड़े युद्ध थे । श्री जी की कृपा से वे सभी युद्धों में विजयी हुए । यही नहीं, श्री जी के आशीर्वाद से पन्ना की धरती से हीरे निकलने लगे ।
छत्ता तेरे राज में, धक धक धरती होय । जित जित घोड़ा पग धरे, तित तित फतह होय ॥
महाराज छत्रसाल ने श्री जी को सदैव परब्रह्म का स्वरूप माना । उनकी अटूट श्रद्धा, समर्पण, और सेवा के कारण उन्हें अमीर-उल-मोमिन (मोमिनों में प्रमुख) कहलाने की शोभा मिली ।
अगला प्रसंग- पन्ना की बीतक
