पन्ना की बीतक
श्री प्राणनाथ लीलामृत - प्रसंग १३७
वि.सं. १७४० में श्री जी पन्ना पधारे और वहां पर ११ वर्ष तक लीला करते रहे ।
बंगला जी में श्री जी की चर्चा होती थी और वहीं पर वे अपना पूरा दिन व्यतीत करते थे ।
महाराज छत्रसाल ने श्री जी के लिए एक विशेष मन्दिर का निर्माण प्रारम्भ करवाया । उन्होंने अपना महल भी पन्ना में बनवा लिया, जिससे वे श्री जी की सेवा और सान्निध्य का लाभ ले सकें ।
पन्ना के बंगला जी में वाणी का बहुत विस्तार हुआ और वहां श्री जी के मुख से अनेक ग्रन्थों का अवतरण हुआ, जैसे खुलासा, खिलवत, परिकरमा, सागर, सिनगार, सिंधी, छोटा कयामतनामा, मारफत सागर । मारफत सागर का अवतरण अन्त में हुआ और उसके प्रकटन के बाद केशवदास को वाणी की जिल्द बांधने की सेवा दे दी गई ।
पन्ना में श्री जी के मुख से अनेक किरंतन भी प्रकट हुए । ऐसे लगभग ४० किरंतन हैं, जिनका प्रारम्भ किरंतन आखिर के शीर्षक से हुआ है ।
पन्ना में उतरे कुछ किरंतन, जिनमें श्री राज जी की शोभा और आत्मा की प्रेममयी स्थिति का वर्णन किया गया है- सरूप सुन्दर सनकूल सकोमल, चतुर चौकस चेतन अति चोपसों, नूर को रूप सरूप अनूप है, हुब मेहेबूब की आसिक प्यास ले, नूर नगन चेतन भूखन रचे, मिली मासूक के मोहोल में माननी ।
इनके अतिरिक्त कुछ अन्य किरंतन जिनका अवतरण पन्ना में हुआ- राजाने मलो रे राणें राए तणो, ऐसा समय जान आए बुध जी, कुली बल देखो रे, साहेब तेरी साहेबी भारी, मांगत हों मेरे दुलहा, जिन सुध सेवा की नहीं, साथजी ऐसी मैं तुमारी गुन्हेगार, आदि ।
छत्ता (महाराज छत्रसाल) के नाम से भी एक किरंतन उतरा- जंजीरां मुसाफ की मोतियों में परोइए जब । जसिया के नाम से एक किरंतन उतरा- हम चडी सखी संग रे रूड़ा राज सों राखो रंग ।
मेड़ता के राजाराम भाई ने महाराज छत्रसाल को पत्र लिखकर पूछा कि यदि उन्होंने सुन्दरसाथ का उत्तरदायित्य सम्भाल लिया है, तो क्या वे स्वयं पन्ना आ जाएं ? इसकी जानकारी मिलने पर श्री जी को दुःख हुआ कि मोमिनों को आने के लिए पूछने की क्या आवश्यकता है ? इस विषय पर एक किरंतन उतरा- मोमिन लिखे मोमिन को कहो तो आवें इत ।
श्री जी के साथ लगभग ५००० सुन्दरसाथ अपना घर छोड़कर आ गए । श्री जी एवं सब सुन्दरसाथ के भोजन, वस्त्र, आदि की व्यवस्था छत्तीस कारखानों (विभाग) के माध्यम से होती थी । रामनगर तक यह सारी व्यवस्था गरीबदास सम्भालते थे । उसके बाद वृन्दावन इस सेवा को सम्भालते रहे ।
पन्ना पहुंचने के बाद से इस सेवा का संचालन लालदास के नेत्तृत्व में होने लगा । लालदास जी की कुशलता यह थी कि वे पूरा समय श्री जी के साथ रहते थे, फिर भी किसी सेवा में कोई चूक नहीं होती थी ।
अगला प्रसंग- श्री जी की आठ प्रहर की वृत्त
