श्री देवचन्द्र को श्री राज जी का साक्षात्कार
श्री प्राणनाथ लीलामृत - प्रसंग १५
वि.सं. १६७८ में एक दिन प्रातः जब श्री देवचन्द्र जी श्याम मन्दिर में भागवत कथा सुन रहे थे, वहां उनके सामने अति सुन्दर, किशोर स्वरूप प्रकट हो गया । यह श्री राज जी का वही आवेश स्वरूप था, जिसने अखण्ड वृन्दावन में रास लीला की थी ।
श्री राज जी ने देवचन्द्र जी से पूछा- "क्या तुम्हे मेरी पहचान है ?"
श्री देवचन्द्र ने उत्तर दिया- "मेरा मन यही गवाही दे रहा है कि आप मेरी आत्मा के प्रियतम हैं । मैं बस यही जानता हूं ।"
तब श्री राज ने पूछा- "क्या तुम अपने आप को पहचानती हो कि तुम कौन हो और कहां से आयी हो ?"
श्री देवचन्द्र ने पुनः वही उत्तर दिया- "मुझे बस इतना ही पता है कि आप मेरी आत्मा के प्रियतम हैं ।"
श्री राज जी कहते हैं- "तुम बस इतना ही जानती हो । अब मैं तुमको सब कुछ बताता हूं । तुम्हारा नाम सुन्दर बाई (श्यामा) है और तुम ब्रज-रास में खेली हो । उन दोनों खेल में मनोरथ पूर्ण न होने के कारण, यह तीसरी बार माया के संसार में आई हो । अब सब सुन्दरसाथ को बुलाकर अपने साथ धाम ले आओ ।"
श्री देवचन्द्र जी ने पूछा- "हे धनी ! वे सुन्दरसाथ कहां हैं ?"
श्री राज ने उत्तर दिया- "मैं उन सबको तुम्हारे पास भेजूंगा । इस भागवत ग्रन्थ में तुम्हारी लीला का वर्णन है, इसलिए इसके गुह्य अर्थ सिर्फ तुम्हें ही खुलेंगे । साधारण जीवसृष्टि इसके रहस्यों को नहीं समझ सकेगी । तुम्हें कुछ और पूछना हो तो अभी पूछ लो क्योंकि इसके बाद मैं पुनः इस प्रकार दर्शन नहीं दूंगा ।"
श्री देवचन्द्र जी ने पूछा- "हे धनी ! अब आप कहां जायेंगे ?"
श्री राज ने उत्तर दिया- "मैं तुम्हारे तन में बैठकर ही लीला करूंगा ।"
तब श्री देवचन्द्र जी कहा- "फिर मुझे क्या पूछना ।"
श्री राज जी और देवचन्द्र जी के बीच होने वाली यह वार्ता ही तारतम के बीज वचन हैं । इसके बाद श्री राज जी का स्वरूप अदृश्य हो गया और देवचन्द्र जी के तन में समा गया । श्री राज जी का साक्षात्कार पाकर देवचन्द्र जी का मन बहुत प्रफुल्लित हुआ ।
इसके बाद श्री देवचन्द्र की दृष्टि अखण्ड धाम तथा अखण्ड ब्रज-रास को देखने लगी । साथ ही उन्हें भागवत ग्रन्थ के सब रहस्य खुल गए । अब उनकी आत्मा में ज्ञान का पूर्ण प्रकाश हो गया ।
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