गांगजी भाई को प्रबोध
श्री प्राणनाथ लीलामृत - प्रसंग १६
साक्षात्कार के पश्चात् श्री देवचन्द्र ने भागवत कथा में जाना बन्द कर दिया । अब उनके मन में यह जिज्ञासा होने लगी कि धाम का यह अलौकिक ज्ञान किसे सुनाऊं ?
श्याम मन्दिर में गांगजी भाई भी कथा सुनने जाते थे । एक दिन मार्ग में देवचन्द्र जी की उनसे भेंट हो गई । देवचन्द्र जी उन्हें रास्ते में खड़े-खड़े ही अखण्ड धाम की बात बताने लगे ।
एक पनिहारी वहां से पानी भरने जा रही थी, तो उसने दोनों को बातें करते देखा । इसके बाद वह दूसरी और फिर तीसरी बार जब वहां से निकली, तो भी वे दोनों वार्ता कर रहे थे । यह देखकर उसे आश्चर्य हुआ कि क्या इन लोगों के पांव और मन थकते नहीं हैं ?
पनिहारी से रहा नहीं गया और उसने कहा- "आप लोग बैठकर बात क्यों नहीं कर लेते ।"
पनिहारी के टोकने पर दोनों को अपने शरीर की सुध आई । इस प्रकार वे दोनों प्रतिदिन धाम की चर्चा करने लगे । गांगजी भाई को विश्वास होने लगा कि अवश्य ही यह कोई अलौकिक ज्ञान है ।
एक दिन गांगजी भाई ने देवचन्द्र जी से पूछा- "हम दोनों भागवत सुनने जाते थे, फिर तुम्हें इन बातों का ज्ञान कहां से प्राप्त हुआ ?"
जब श्री देवचन्द्र जी ने देखा कि गांगजी भाई में अखण्ड ज्ञान की पात्रता है, तो धीरे-धीरे कुछ बातें बताते गए । जब गांगजी भाई की जिज्ञासा बहुत बढ़ गई, तब उन्होंने अपनी सारी बीतक कह सुनाई ।
यह सब सुनकर गांगजी भाई को बहुत प्रसन्नता हुई और उन्होंने श्री देवचन्द्र को श्री राज जी का स्वरूप मानकर अपने घर में आदरपूर्वक पधराया । गांगजी भाई के घर पर देवचन्द्र जी की चर्चा होने लगी । धीरे-धीरे यह बात फैल गई और बहुत लोग चर्चा सुनने आने लगे ।
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