Logo  Kuljam.org

विषय-सूची

श्री देवचन्द्र के पास सुन्दरसाथ आगमन

श्री प्राणनाथ लीलामृत - प्रसंग १७

सबसे पहले गांगजी भाई ने देवचन्द्र जी के चरणों में अपनी आत्मा को समर्पित किया और तारतम ग्रहण किया । उन्होंने देवचन्द्र जी को साक्षात् अक्षरातीत मानकर उनकी सेवा की ।

श्री देवचन्द्र जी की पत्नी लीलबाई ने बहुत स्नेह से अपने पति की सेवा करी और श्री राज जी ने कृपा करके लीलबाई को दर्शन और शोभा प्रदान की । श्री देवचन्द्र जी की दो संतान थीं- बिहारी जी और यमुना बाई । बिहारी जी के अन्दर धाम की रतन बाई की आत्मा थी, परन्तु उनके जीव का मन आध्यात्मिकता में नहीं लगता था । यमुना बाई पूरी तरह धाम धनी पर समर्पित थी ।

भोजनगर में जिन हरिदास जी की देवचन्द्र जी ने सेवा की थी, जब उन्हें देवचन्द्र जी के स्वरूप की पहचान हुई तो उन्होंने देवचन्द्र जी के चरण पकड़ लिए । उन्होंने सेवा करके देवचन्द्र जी को सुख दिया और उनके चरणों में अपनी आत्मा को समर्पित कर दिया । यह अद्वितीय घटना है, जिसमें गुरु ने शिष्य के चरणों में समर्पण कर दिया ।

हरिदास जी का पूरा परिवार श्री देवचन्द्र जी की शरण में आ गया । उनकी पत्नी को थोड़ी पहचान हुई । उनका पुत्र वृन्दावन और पुत्रवधू मूलीबाई पूरी तरह से देवचन्द्र जी पर समर्पित हो गए ।

गांगजी भाई की माता गंगाबाई भी देवचन्द्र जी पर समर्पित हुई । श्री देवचन्द्र जी ने उनकी सभी इच्छाओं को पूर्ण कर दिया ।

गांगजी भाई की पत्नी भानबाई को अधिक श्रद्धा नहीं थी । वे पूछ-पूछ कर सेवा करती थीं ।

गांगजी भाई के दो पुत्र थे- श्यामजी और मानजी । श्यामजी में धाम का अंकुर नहीं था, इसलिए बहुत चर्चा सुनने पर भी उसे ईमान नहीं आया । श्यामजी की पत्नी अजबाई सच्चे हृदय से सेवा में तत्पर रहती थी । मानजी भी सेवा में तत्पर रहता था । मानजी के बेटे में श्री देवचन्द्र जी ने धाम की सुखबाई की आत्मा को परखा था ।

गांगजी भाई के दो भाई और एक बहन थी- खेता भाई, गोविन्दजी और बाल बाई । खेता भाई अरब में रहते थे, परन्तु उनकी पत्नी हीरबाई ने धाम धनी श्री देवचन्द्र जी की सेवा करके बहुत सुख पाया । हीरबाई के बेटे का नाम धनजी था । गोविन्दजी की धार्मिक कार्यों में रुचि नहीं थी और वे इससे दूर ही रहते थे । बाल बाई भी तारतम लेकर सुन्दरसाथ में शामिल हुई ।

सुन्दरसाथ में एक जीवराज भाई थे, जिनके अन्दर तान बाई की आत्मा थी । उनकी माता बछाई बाई को भी देवचन्द्र जी के स्वरूप की पूरी पहचान थी ।

नवतनपुरी के अतिरिक्त जूनागढ़, दीव, मंडई, ठट्ठानगर, आदि अनेक स्थानों से सुन्दरसाथ आकर धनी श्री देवचन्द्र जी की अलौकिक चर्चा को सुनते और उन्हें अपना धाम धनी मानकर सच्चे हृदय से उनकी सेवा करते ।

अगला प्रसंग- श्री देवचन्द्र द्वारा अलौकिक ज्ञान चर्चा