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परब्रह्म के विषय में जिज्ञासा

श्री प्राणनाथ लीलामृत - प्रसंग ३

जब श्री देवचन्द्र जी की आयु ११ वर्ष की हुई, तो उनके मन में यह जिज्ञासा उत्पन्न हुई- "मैं कौन हूं, कहां से आया हूं, और मेरी आत्मा के स्वामी कौन हैं ?"

वे जहां जाते, तो लोगों से यही प्रश्न पूछते कि जिसने सबको पैदा किया वह परमेश्वर कहां है ? किसी ने उनसे कह दिया कि परमात्मा संसार के कण-कण में व्यापक है । उसकी बात सुनकर श्री देवचन्द्र जी को लगा कि जब वह मेरे इतने निकट हैं, तो मैं उन्हें अवश्य प्राप्त कर लूंगा ।

श्री देवचन्द्र जी के गांव के बाहर एक छोटा सा मन्दिर था, जिसमें पिंगल श्याम (कृष्ण जी) की मूर्ति स्थापित थी । वे प्रतिदिन प्रातः घर से लोटा लेकर जाते, नित्य कर्म और स्नान आदि से निवृत्त होकर, मन्दिर में एक प्रहर (तीन घण्टे) परिक्रमा करते, फिर दण्डवत प्रणाम करते । इस प्रकार अल्पायु में ही वे कठोर परिश्रम से भक्ति करने लगे ।

उनके गांव में जल की कमी थी, इसलिए कोई साधु-सन्त वहां नहीं आते थे । एक बार श्री देवचन्द्र जी अपने पिता के साथ कच्छ गये, तो वहां पर उन्होंने बहुत साधुओं और मन्दिरों को देखा ।

तभी से यह बात उनके मन में बैठ गई- "यदि मैं कच्छ चला जाऊं और वहां परमात्मा की खोज करूं, तो वे मुझे मिल सकते हैं ।"

अब श्री देवचन्द्र जी के मन में वैराग्य की भावना पनपने लगी और संसार के लोगों से कोई सम्बन्ध रखने की उन्हें इच्छा नहीं होती थी । सब लोग उन्हें समझा-समझाकर थक गए कि किसी प्रकार उनका मन घर-गृहस्थी के कार्यों में लग जाए, परन्तु उनके आचरण में कोई परिवर्तन नहीं हुआ ।

देवचन्द्र जी के मन में एक ही इच्छा थी- "मैं गांव से बाहर जाकर परमेश्वर की खोज करूं ।" वे लोगों से कच्छ जाने का मार्ग पूछने लगे ।

एक दिन श्री देवचन्द्र जी को पता चला कि उमरकोट का एक मंत्री दो सौ सवारों के साथ राजकुमार की तलवार लेकर कच्छ जाने वाला था । जब किसी राजपुरुष का जाना सुरक्षित न हो, तो उसकी तलवार भेजकर विवाह करवा लिया जाता था ।

यह बात सुनते ही श्री देवचन्द्र जी मंत्री से मिलने पहुंच गये और उनसे कहा- "मैं भी बारात के साथ कच्छ जाना चाहता हूं ।"

इस पर मंत्री ने पूछा- "तुम्हारे पास कौन-सी सवारी है ?"

जब उसे पता चला कि वे तो पैदल आना चाहते हैं, तो उसने मना किया कि घुड़सवारों के साथ वहां तक पैदल चलना सम्भव नहीं है । तब श्री देवचन्द्र जी ने कहा कि वे पैदल चल सकते हैं, परन्तु मंत्री ने अपने साथ ले चलने से मना कर दिया ।

अब श्री देवचन्द्र जी ने सोचा- "मैं इनसे क्यों पूछता हूं, जब बारात निकलेगी, तो मैं इनके पीछे-पीछे पैदल चला जाऊंगा ।"

घर जाकर उन्होंने यात्रा की तैयारी प्रारम्भ कर दी । कुछ बर्तन, वस्त्र, अन्न, आदि की गठरी तैयार कर ली और सुरक्षा के लिए एक खरची (कटार) भी रख ली ।

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