श्री देवचन्द्र द्वारा गृह त्याग एवं मार्ग में दर्शन
श्री प्राणनाथ लीलामृत - प्रसंग ४
जब श्री देवचन्द्र जी ने परमात्मा की खोज के लिए गृह-त्याग किया, उस समय उनकी सोलह वर्ष की किशोरावस्था थी । यात्रा का दिन आ गया ।
दोपहर का भोजन करके वे कुछ देर के लिए विश्राम करने लगे । जब उनकी निद्रा खुली, तब तक साढ़े चार बज चुके थे । बारात के जाने का समय हो गया था । तैयार होने में श्री देवचन्द्र जी को कुछ विलम्ब हो गया और इस दौरान बारात निकल गई । अब वे उतावलेपन में घुड़सवारों के पीछे-पीछे पैदल चल पड़े ।
श्री देवचन्द्र जी चले जा रहे थे । इतने में रात का समय हो गया । मरुस्थल में चारों तरफ रेत ही रेत दिख रही थी । एक तरफ मार्ग नहीं मिल रहा था, तो दूसरी तरफ चोरों का डर था । वे कुछ घबरा गए कि अब इस रेगिस्तान में वे किससे मार्ग पूछें या सहायता मांगें ? उनके पेट में दर्द होने लगा, फिर भी वे चलते गये ।
श्री देवचन्द्र जी चिन्ता में चले जा रहे थे कि उन्हें एक व्यक्ति ने दर्शन दिया । उसे देखते ही उनके मन का भय बढ़ गया- "यह चोर मुझे मार डालेगा ।"
अब उन्हें बचने का कोई मार्ग नहीं सूझ रहा था । इतने में वह व्यक्ति उनके निकट आ गया ।
उस व्यक्ति ने सिपाही का भेष धारण कर रखा था । उसके मुख पर दाढ़ी थी, हाथ में बरछी थी, और कमर पर तलवार लटक रही थी । स्वयं श्री राज ऐसा भेष धारण करके देवचन्द्र जी की सहायता करने आये थे ।
सिपाही के भेष में आये श्री राज ने देवचन्द्र जी से उनकी तलवार और गठरी ले ली । फिर उन्होंने अपनी पिछौरी जमीन पर बिछा दी और देवचन्द्र जी को उस पर लेटने के लिए कहा । यह सुनकर देवचन्द्र जी का मन भय से कांपने लगा । उन्हें लगा कि वह उनकी हत्या कर देगा ।
तब श्री राज ने देवचन्द्र जी की जांघ के मूल पर अपना एक पांव रखकर शरीर का थोड़ा बोझ डाला । फिर उन्होंने देवचन्द्र जी से पूछा- "पेट दर्द कुछ कम हुआ ?"
देवचन्द्र जी ने उत्तर दिया- "वहां तो दर्द कम हो गया, परन्तु दूसरी तरफ अभी भी है ।"
तब राज जी ने दूसरी जांघ के मूल पर पैर से दबाया । ऐसा करने से देवचन्द्र जी के पेट का दर्द पूरी तरह समाप्त हो गया ।
श्री राज ने अपनी पिछौरी देवचन्द्र जी की कमर पर बांध दी और उनकी गठरी को अपनी पीठ पर लाद लिया । देवचन्द्र जी को विश्वास हो गया था कि वह सिपाही उनकी हत्या नहीं करेगा, परन्तु यह आशंका मन में आ गई कि वह उन्हें बन्दी बनाकर सेवा करवाएगा ।
यहां से दोनों मिलकर तेज कदमों से चलने लगे । अब श्री राज उनसे सांसारिक बातें पूछने लगे, जैसे उनका नाम, पता, माता-पिता का नाम, राजा और मंत्री का व्यवहार, आदि । इस प्रकार बातें करते-करते, जब थोड़ी रात बाकी रह गई, तब वे दोनों बारातियों के निकट पहुंच गए ।
श्री राज ने देवचन्द्र जी की कमर से अपनी पिछौरी उतरवाकर वापस ले ली, और उनकी गठरी और तलवार उनको वापस दे दी । फिर उन्होंने बारात की तरफ संकेत करते हुए देवचन्द्र जी से कहा- "देखो, वे रहे तुम्हारे साथी ।"
जब श्री देवचन्द्र उस तरफ देखने लगे, उसी समय श्री राज अन्तर्धान हो गये ।
अब श्री देवचन्द्र सोचने लगे कि वह सिपाही कौन था और कहां गया ? उन्हे विश्वास हो गया- "वे अवश्य मेरी आत्मा के प्रियतम थे, जिनकी खोज में मैं निकला हूं ।"
श्री देवचन्द्र उन्हें याद करके विलाप करने लगे । फिर उन्होंने सोचा- "इस घटना से यह स्पष्ट है कि परमात्मा सदैव मेरे सिर पर हैं और मैं कहीं भी चला जाऊं वे मुझे छोड़ेंगे नहीं ।"
अन्ततः वे निश्चिन्त हो गये कि किसी प्रकार उन्हें खोज ही लेंगे ।
जब श्री देवचन्द्र जी बारातियों से मिले, तो वे उन्हे मंत्री के पास ले गये ।
देवचन्द्र जी को देखकर मंत्री को बहुत आश्चर्य हुआ और उसने पूछा- "तुम बिना किसी सवारी के रात्रि में इतनी दूर तक पैदल कैसे आ गये ?"
श्री देवचन्द्र ने कहा- "जैसे हवा बहती है, उसी तरह आपके पीछे-पीछे चलता आया ।"
किसी को भी उनकी बात पर विश्वास नहीं हो रहा था । उस समय कुछ बाराती लेटने के लिए तम्बू गाड़ रहे थे और कुछ लोग भोजन पकाने के लिए अग्नि जला रहे थे ।
तब उस कायस्थ मंत्री ने देवचन्द्र जी से कहा- "या तो तुम भोजन बनाने की सामग्री ले लो या फिर हमारे साथ भोजन करो ।"
श्री देवचन्द्र ने मना करते हुए उत्तर दिया- "मैं अपने हाथ का बना भोजन ही करता हूं ।"
मंत्री ने उनसे सीधा (राशन) लेने का पुनः आग्रह किया, परन्तु देवचन्द्र जी ने मना कर दिया क्योंकि वे घर से आटा आदि लाए थे । जब मंत्री दुःखी होने लगा, तो उन्होंने उनसे सीधा लेना स्वीकार कर लिया ।
श्री देवचन्द्र जी ने स्वयं अपने लिए भोजन बनाया और उसी स्वरूप को भोग लगाया जिसने उन्हें मरुभूमि में दर्शन दिया था । फिर प्रसाद ग्रहण करके वे सो गए और उठने पर बारातियों के साथ ऊंट पर सवार होकर कच्छ पहुंच गए ।
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