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बिहारी जी द्वारा वाणी पर प्रतिबन्ध

श्री प्राणनाथ लीलामृत - प्रसंग ३४

जब कुतुब खां से बातचीत करके वजीर वापस जामनगर आया, तब महल में उसकी पत्नी ने कहा- "आपने मेहेराज पर ऐसा अत्याचार क्यों किया ? एक तो उनका घर लूट लिया, फिर उन्हें परिवार सहित नजरबन्द कर दिया । एक वर्ष बीत गया है, आपने ऐसा जुल्म क्यों किया ? इन्हें नजरबन्दी से मुक्त करके, सिरोपाव देकर, सम्मानपूर्वक विदा कीजिए ।"

सम्भवतः वाणी के अवतरण के दौरान उत्पन्न अलौकिक प्रकाश और मधुर ध्वनि सुनकर महल के सभी लोगों का हृदय परिवर्तित हो गया था । वजीर ने अपनी पत्नी की बात मानकर श्री मेहेराज व उनके भाइयों को तुरन्त मुक्त कर दिया ।

ब्रह्मज्ञान के अवतरण से श्री मेहेराज का हृदय अत्यधिक आनन्दित था । धाम धनी श्री राज की कृपा से उन्हें अनमोल निधि प्राप्त हुई थी, फलस्वरूप अब उन्हें युगल स्वरूप के चरणों के अतिरिक्त और कोई आस नहीं थी ।

तीनों किताबें लेकर श्री मेहेराज सीधे बिहारी जी के पास गए और अपनी सारी बीतक कह सुनाई । बिहारी जी ने रास, प्रकास और खटरूती का अवलोकन किया ।

खटरूती में श्री इन्द्रावती जी ने कहा है- "मैंने अपने धाम धनी को पा लिया है ।"

इन वचनों को पढ़कर बिहारी जी को खटका लगा कि ये तो सुन्दरसाथ को मुझसे छीनकर स्वयं राज जी कहलाना चाहते हैं । तब उन्होंने मन-ही-मन संकल्प कर लिया कि इस वाणी को समाज में फैलने नहीं देेंगे ।

वाणी के प्रसार को रोकने के लिए बिहारी जी ने बहाना बनाते हुए कहा- "मैं तो इसी शहर में तुम्हारी आंखों के सामने बैठा था, फिर तुम्हें इतना विरह करने की क्या आवश्यकता थी ? तुम्हारे विरह का दोष तो मुझे ही लगेगा, इसलिए तुम इस पुस्तक को रहने दो । अपना जो चर्चा सुनाने का मार्ग है, वही ठीक है ।"

सुन्दरसाथ समझ गए थे कि राज जी ने श्री मेहेराज पर बहुत मेहेर करके उनके मुख से वाणी कहलवाई है और सबका हाथ उनके हाथ में सौंपा है, परन्तु बिहारी जी ने उस समय वाणी के ज्ञान को फैलने नहीं दिया । सुन्दरसाथ प्रतीक्षा करते रहे पर वाणी का एक भी शब्द नहीं सुन सके ।

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