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हरजी व्यास का प्रसंग

श्री प्राणनाथ लीलामृत - प्रसंग ३५

वि.सं. १७१६ में श्री प्राणनाथ जी जूनागढ़ में गांव बसाने के लिए गए ।

जूनागढ़ जाते समय मार्ग में धौराजी गांव में श्री जी की भेंट तेज कुंवरी से हुई । फूलबाई के तन में विराजमान अमलावती की आत्मा ने ही तेज कुंवरी के तन में प्रवेश कर लिया था । तेज कुंवरी ने श्री जी को देखते ही पहचान लिया, इसलिए उनका विवाह श्री जी से कर दिया गया ।

वि.सं. १७१८ में जूनागढ़ में श्री प्राणनाथ जी की भेंट कान्हजी भाई से हुई । वैसे तो कान्हजी भाई एक सुन्दरसाथ थे, परन्तु वे एक ब्राह्मण हरजी व्यास के यहां नौकरी करते थे ।

जब हरजी व्यास मृत्यु शय्या पर पड़े थे, तो उनके परिवार के लोग उनके हाथों दान करवाने लगे । हरजी व्यास इसका विरोध करते थे- "मेरे हाथों से दान क्यों करवा रहे हो ? दान तो यमपुरी का साधन है । मैं इस इण्ड का नहीं हूं । मेरे मन को दुःखी मत करो ।"

इसके अतिरिक्त हरजी व्यास यह भी कहते थे- "मैं दो बातों की दाझ लेकर जा रहा हूं कि जिसको मैंने 'हां' कहा उसे किसी ने 'ना' नहीं कहा, और जिसको मैंने 'ना' कहा उसे किसी ने 'हां' नहीं कहा ।"

हरजी व्यास की ये दोनों बातें सुनकर कान्हजी भाई के मन में दाझ उपजी कि कहीं ये परमधाम की आत्मा (ब्रह्मसृष्टि) तो नहीं है ?

कान्हजी भाई ने सारा दृष्टान्त श्री जी को सुनाया । श्री जी ने कहा कि यदि ये जीवित रहते हैं, तो मैं इन्हें परमधाम की चर्चा सुना सकता हूं ।

श्री जी की बात सुनकर कान्हजी भाई सच्चे दिल से हरजी व्यास की सेवा में लग गए । कान्हजी भाई नित्य ताजी तरकारी लाकर उन्हें गुणकारी भोजन करवाते । कई दिनों के परिश्रम के बाद हरजी व्यास स्वस्थ हो गए और कान्हजी भाई की सेवा से प्रसन्न होकर उनसे कुछ मांगने का आग्रह करने लगे ।

कान्हजी भाई ने कहा- "मैं बस इतना चाहता हूं कि आप मेरे एक परिचित साधू को चर्चा सुनाएं ।"

हरजी व्यास यह सुनकर बहुत खुश हुए । तब कान्हजी भाई ने श्री जी को हरजी व्यास से मिलवा दिया । हरजी व्यास ने श्री जी से पूछा- "आप कहां रहते हैं ?"

श्री जी ने उत्तर दिया- "हम तो परदेश के हैं । आपकी विद्वता की प्रशंसा सुनकर यहां आये हैं ।"

हरजी व्यास ने अपने बाग में श्री जी के रहने की व्यवस्था कर दी और उन्हें भागवत की कथा सुनाने लगे । इस प्रकार श्री जी दो मास तक उनके मुख से चर्चा सुनते रहे ।

एक दिन हरजी व्यास ने चर्चा में कहा- "एक हीरे का मन्दिर है, जो ८४ लाख योजन बड़ा है ।"

श्री जी ने पूछा- "यह किसका ठौर है ?"

हरजी व्यास ने उत्तर दिया- "शास्त्रों में लिखा है कि यह अक्षर का ठौर है ।"

श्री जी ने पूछा- "मुझे विस्तार से बताइए कि यह ठौर ब्रह्माण्ड के ऊपर, नीचे, अन्दर, या बाहर है, या ब्रह्माण्ड से परे है ? आप पहले ही कह चुके हैं कि महाप्रलय में पांच तत्व, तीन गुण और मूल प्रकृति का नाश हो जाता है, तो यह अक्षर का ठौर कहां है ?"

हरजी व्यास ने कहा- "शास्त्रों में लिखा है कि यह क्षीर सागर में रहने वाले आदि नारायण का ठौर है ।"

श्री जी ने पुनः पूछा- "यह तो आपने ब्रह्माण्ड के अन्दर की बात कर दी । महाप्रलय में तीन गुणों समेत समस्त ब्रह्माण्ड का नाश हो जाता है, तो यह ठौर कहां रहती है ?"

तब हारकर हरजी व्यास ने कहा- "मैं तुमसे क्या कहूं ? जब शास्त्रों में ऐसा ही लिखा है, तो मैं इसका क्या उत्तर दूं ?"

तभी कान्हजी भाई श्री जी से बोले- "आप इनसे अक्षरातीत के विषय में कुछ पूछ कर देखिए ।"

यह सुनकर श्री जी को जोश आ गया और उन्होंने कान्हजी भाई को धक्का देते हुए कहा- "इनसे क्या पूछें ? इनमें क्या ज्ञान है ? ये तो क्षर जगत में ही थक गए । जिसे अक्षर की सुध नहीं है, वे अक्षरातीत के विषय में क्या उत्तर देंगे ।"

श्री प्राणनाथ जी के कठोर वचनों को सुनकर हरजी व्यास समझ गए कि ये लोग दिव्य परमधाम की बात कर रहे हैं ।

तब श्री जी ने हरजी व्यास से कहा- "मैं तुम्हारे पास चर्चा सुनने इसलिए आया था कि अन्त समय में तुमने जो दो बातें कही थीं, उसका अहं नष्ट कर सकूं । परब्रह्म ने मुझे आपकी अज्ञानता नष्ट करने के लिए भेजा है ।"

हरजी व्यास प्रायश्चित भरे स्वर में बोले- "हे भक्तराज ! यह सच है कि मैंने ऐसा इसीलिए कहा था कि मुझे परब्रह्म का ज्ञान मिले । गूलर के वृक्ष में अनेक गूलर के फल लगे होते हैं । उन फलों में अनेक कीड़े रहते हैं, जो एक-दूसरे को नहीं जानते । मैं भी गूलर में रहने वाले एक जीव के समान हूं, जो कुछ पण्डितों को हराकर अहं से भर गया था । आज मैं आपके सामने हार मानता हूं । आपको निश्चित ही परब्रह्म ने मेरे उद्धार के लिए भेजा है । आप मुझे अखण्ड मुक्ति का मार्ग दिखाइए ।"

हरजी व्यास का जितना अंकुर था, उतना ज्ञान उन्होंने ग्रहण किया । फिर उनसे विदा लेकर श्री जी नवतनपुरी आ गए ।

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