श्री देवचन्द्र द्वारा कच्छ में खोज
श्री प्राणनाथ लीलामृत - प्रसंग ५
कच्छ पहुंचकर श्री देवचन्द्र जी परब्रह्म की खोज में जुट गए ।
सर्वप्रथम, वे एक मन्दिर में गए । वहां उन्होंने पूछा- "चर्चा (प्रवचन) कब होती है ?"
इसके उत्तर में उन लोगों ने मन्दिर में स्थापित प्रतिमा की ओर संकेत करते हुए कहा- "जब साक्षात् परमात्मा यहां विराजमान हैं, तो चर्चा की क्या आवश्यकता है ?"
देवचन्द्र जी कुछ दिन वहां रहे, परन्तु उनका मन नहीं माना और उन्हें वह मार्ग सही नहीं लगा । अतः वे खोज करने आगे निकल पड़े ।
फिर श्री देवचन्द्र की भेंट सन्यासियों से हुई, जो महर्षि दत्तात्रेय द्वारा चलाये गये मार्ग का अनुसरण करते थे । उन लोगों ने विचित्र प्रकार की वेश-भूषा धारण कर रखी थी और आम जनता उनकी पूजा करती थी ।
सन्यासियों ने कहा- "हमें परमतत्व का पूर्ण ज्ञान है और यदि तुम नाम सुमरन (मन्त्र दीक्षा) ले लो तो तुम्हें भी सब कुछ प्राप्त हो जाएगा ।"
देवचन्द्र जी ने उनसे नाम सुमरन ले लिया और कुछ दिन तक उनके बताये मार्ग का अनुसरण करते रहे, परन्तु कुछ उपलब्धि नहीं हुई । जब मन को सन्तोष नहीं हुआ, तो वे खोज के लिए पुनः आगे निकल पड़े ।
आगे श्री देवचन्द्र जी कनफटे सन्यासियों (नाथ पन्थ) से मिले । वे लोग राजगुरु कहलाते थे और उनके शिष्यों की संख्या बहुत अधिक थी । कच्छ के बहुत लोग उनके पन्थ से जुड़े हुए थे । कुछ दिनों तक देवचन्द्र जी उनकी बतायी विधि से साधना करते रहे, परन्तु दिल में कुछ सन्तोष नहीं हुआ । उनके पास देवचन्द्र जी के प्रश्नों का कोई उत्तर भी नहीं था, इसलिए देवचन्द्र जी ने आगे की राह पकड़ी ।
अब श्री देवचन्द्र जी कापड़ी वैरागियों के साथ कुछ दिन रहे । ये लोग अपने मन और इन्द्रियों के विषय भोगों में फंसे हुए थे । उनके अन्दर कोई आध्यात्मिक ज्ञान न पाकर देवचन्द्र जी आगे बढ़ गए ।
इसी भांति वे मस्जिद में भी कुछ दिन रहे और मुल्ला से परमात्मा के विषय में ज्ञान-चर्चा करते रहे, परन्तु वहां भी कोई प्रकाश नहीं दिखा ।
इस प्रकार, श्री देवचन्द्र जी अनेक पन्थों और सम्प्रदायों में खोज करते रहे कि कहीं पर परमात्मा का ज्ञान या उन्हें पाने का उचित मार्ग मिल जाए । इस उद्देश्य से उन्होंने बहुत मेहनत करी, परन्तु उन्हें कहीं भी सन्तोष नहीं हुआ ।
अन्त में थक-हारकर वे भोजनगर (भुज) आ गए और हरिदास जी की संगति में रहने लगे ।
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