भैरों ठक्कर की जागनी
श्री प्राणनाथ लीलामृत - प्रसंग ४७
एक दिन श्री जी ने भैरों ठक्कर से कहा- "तुम हमें यहां बुला लाए हो । तुमने सुन्दरसाथ को लुटेरों के बन्धन से मुक्त करवाया और इस समय भी उनकी सेवा कर रहे हो । तुम्हारे उपकार का बदला मैं कौन सी वस्तु देकर चुकाऊं ? मेरे पास जो वस्तु (तारतम ज्ञान) है, सो मैं तुम्हारे आगे रखता हूं । तुम उसे चित्त में ग्रहण कर लो, जिससे तुम्हारी आत्मा को फल प्राप्त हो ।"
तब भैरों ठक्कर ने बड़ी विनम्रता से उत्तर दिया- "आपने मुझ पर कृपा करी है, जो ऐसा अलौकिक ज्ञान सुनाया है ।"
तब श्री जी ने कहा- "यदि तुम कुछ बातों का परहेज करो, तो तुम्हें घर बैठे सहजता से परब्रह्म के चरण प्राप्त हो जायेंगे । तुम्हें तम्बाकू, मांस, मछली, शराब व अन्य नशीले पदार्थ, परस्त्री गमन, और चोरी से एक मास तक परहेज रखना होगा । यदि इतने समय में तुम्हें चरण प्राप्त न हों, तो अपना परहेज तोड़कर मुझे यहां से विदा कर देना । मैं अपने घर चला जाऊंगा और तुम पुनः माया में मग्न हो जाना ।"
भैरों ठक्कर ने उत्तर दिया- "यह तो बहुत सरल है । मैं अवश्य इन बातों का परहेज करूंगा । इतनी मेहनत से यदि मेरी आत्मा जाग्रत होती है, तो और क्या चाहिए ।"
उस समय भैरों ठक्कर के सामने हुक्का रखा था । उसने तुरन्त हुक्का फोड़ दिया और श्री जी द्वारा बताई गई चार वस्तुओं से एक मास तक परहेज रखने का प्रण कर लिया । उसने अपने घर वालों को आदेश दिया कि उसका भोजन अलग से बनाया जाए, जिसमें मांस-मछली का अंश न हो ।
भैरों ठक्कर का व्यवहार देखकर घर के लोग बड़-बड़ करने लगे- "यह कैसे साधू हमारे घर आ गए, जिन्होंने इस तरह का परहेज करवाया ? सेठ जी का तो गुजारा ही इन्हीं वस्तुओं से होता था ।"
तब भैरों ठक्कर ने खीजकर घर वालों से कहा- "मैंने सिर्फ कुछ दिनों के लिए परहेज करने का प्रण किया है । यदि मुझे कुछ प्राप्त नहीं हुआ, तो मैं परहेज तोड़ दूंगा ।"
इस प्रकार दृढ़ता से अपने प्रण का पालन करते हुए भैरों ठक्कर श्री जी की चर्चा सुनने लगे । तीसरे दिन की चर्चा के बाद ही उसने श्री जी से कहा- "मैंने जन्म-भर के लिए इन चारों निषिद्ध वस्तुओं को छोड़ दिया है । मुझे वस्तु (दर्शन) प्राप्त हो गई है ।"
इस प्रकार भैरों सेठ तारतम लेकर सुन्दरसाथ में शामिल हो गए ।
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