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राधा-वल्लभी मार्ग में दीक्षा

श्री प्राणनाथ लीलामृत - प्रसंग ६

हरिदास जी राधा-वल्लभी सम्प्रदाय के अनुयायी थे । अपनी आत्मा के कल्याण की भावना से वे सखी भाव से श्री कृष्ण जी की सेवा किया करते थे ।

हरिदास जी के पास आकर देवचन्द्र जी के मन को शान्ति मिली । उन्होंने देखा कि हरिदास जी अति प्रेम भाव और सच्चे हृदय से निष्ठापूर्वक सेवा करते हैं ।

हरिदास जी ने अपने घर पर ही मन्दिर बना रखा था, जिसमें बांके बिहारी (रास लीला करने वाले स्वरूप) और बाल मुकुन्द (ब्रज लीला करने वाले बाल स्वरूप) की मूर्ति पधराई हुई थी । वे उन्हें साक्षात् मानकर सेवा करते थे । गर्मी की ऋतु में ठंडक बनाये रखने का प्रयास करते और शीत ऋतु में गर्मी का उपाय करते ।

सेवा में जिस वस्तु की आवश्यकता पड़ सकती है, हरिदास जी उसकी पहले से व्यवस्था कर लेते । शुद्धि बनाये रखने के लिए दिन में २-४ बार स्नान करते । देवचन्द्र जी ने अनुभव किया कि ऐसी सच्ची भावना से सेवा करने वाला कोई दुर्लभ ही होगा ।

अब श्री देवचन्द्र जी विचार करने लगे- "यदि मैं इनकी सेवा करूं, तो मुझे अखण्ड निधि प्राप्त हो सकती है ।"

इसी भावना से वे हरिदास जी के साथ रहकर सेवा करने लगे । वे उनसे प्रतिदिन चर्चा भी सुनते थे ।

जब देवचन्द्र जी के पिता को पता चला कि वे हरिदास जी के यहां हैं, तो माता-पिता तुरन्त वहां आ गये और उन्हें गृहस्थी में रहते हुए सांसारिक जीवन बिताने का उपदेश देने लगे । माता-पिता कह-कहकर थक गए, परन्तु देवचन्द्र जी की निष्ठा जरा भी नहीं डगमगायी । माया के कार्यों में देवचन्द्र जी का जरा भी मन नहीं लगता था और उनकी वैराग्य भावना से माता-पिता दुःखी रहते थे ।

श्री देवचन्द्र जी की सच्ची निष्ठा देखकर हरिदास जी ने उन्हें नाम सुमरन (मन्त्र दीक्षा) देने का संकल्प किया । दूसरी तरफ, मत्तू मेहता किसी भी प्रकार से उन्हें माया में फंसाने के लिए तत्पर थे, इसलिए उन्होंने देवचन्द्र जी को विवाह के बन्धन में बांधने का संकल्प कर लिया । जिस दिन हरिदास जी उन्हें दीक्षा देना चाहते थे, वही दिन विवाह के लिए भी निश्चित हुआ ।

राधा-वल्लभी मार्ग में दीक्षा लेने के लिए भद्र भेष (मुण्डन) होना अनिवार्य है । दीक्षा के दिन, हरिदास जी के कहने पर देवचन्द्र जी तत्काल भद्र भेष होकर आ गए ।

अब हरिदास जी ने पूछा- "पहले किसी से नाम सुमरन लिया है ?"

देवचन्द्र जी ने उत्तर दिया- "मैंने एक सन्यासी पर विश्वास करके उससे नाम सुमरन लिया था ।"

पुनः हरिदास जी ने कहा- "तुमने जो मन्त्र लिया था, उसे किसी कागज पर लिखकर रोटी में छिपाकर किसी सन्यासी को दान कर दो, जिससे वह उनके पास वापस चला जाएगा ।"

देवचन्द्र जी ने उत्तर दिया- "इससे कुछ नहीं होगा क्योंकि यदि वह मन्त्र शक्तिशाली होगा तो मेरे हृदय से निकल नहीं सकेगा, और यदि आपका मन्त्र शक्तिशाली है तो पिछला मन्त्र अपने आप मन से निकल जाएगा ।"

श्री देवचन्द्र जी के मुख से ऐसी अनोखी बात सुनकर हरिदास जी बहुत प्रभावित और प्रसन्न हुए । उन्होंने देवचन्द्र जी से कहा- "कुंज बिहारी के स्वरूप को अपने सम्मुख मानते हुए हृदय में इस मन्त्र का सदा जाप करते रहो, 'भजमन श्री वृन्दावन कुंज बिहारी नित विलास' ।"

साथ में यह भी उपदेश दिया कि सदैव सखी भाव से अपने प्रियतम को भजना ।

इसके पश्चात् जब श्री देवचन्द्र जी घर आये, तो उनका भद्र भेष (मुण्डन) देखकर उनके पिता बहुत शोर करने लगे- "यह कैसा काम किया, आज तो तुम्हें श्रृंगार करना चाहिए था ।"

ऐसा कहकर वे दुःखी मन से रोने-पीटने लगे ।

इस प्रकार का विलाप देखकर देवचन्द्र जी ने उत्तर दिया- "आज के दिन आप क्या करना चाहते थे ? मुझे जिनसे विवाह करना था मैंने कर लिया है । मैंने तो पहले ही आपको मना किया था कि मेरा मन गृहस्थी में नहीं लगता ।"

इस खटपट के बीच श्री देवचन्द्र का विवाह सम्पन्न हुआ । विवाह के पश्चात् भी श्री देवचन्द्र जी पूर्ववत् हरिदास जी की सेवा करते रहे ।

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