दोनों स्वरूपों में मत वैभिन्य
श्री प्राणनाथ लीलामृत - प्रसंग ५३
बिहारी जी का सेवा-सत्कार करने और उन्हें मूल्यवान वस्तुएं भेंट करने के पश्चात् श्री जी ने उनसे अर्ज करी- "कृपया धारा भाई को सुन्दरसाथ में शामिल कर लीजिए । मैं उसका ऋणी हूं कि उसने आपके आने का शुभ समाचार मुझे दिया । तब मैंने उसे वचन दे दिया था । यदि मैं अपना जीव भी उस पर न्यौछावर कर दूं, तो उसके इस उपकार का बदला नहीं चुका सकता । इसलिए आपसे प्रर्थना है कि उसे सुन्दरसाथ में शामिल कर लीजिए । वह आपके चरणों में पूरी तरह समर्पित है ।"
तब बिहारी जी ने बहुत खीझकर कहा- "मैं इसे सुन्दरसाथ में दाखिल नहीं करूंगा । इसने मुझे बहुत दुःखी किया है, इसलिए कभी इसका हाथ नहीं पकड़ूंगा । यह मेरा हुक्म है कि तुम यह अर्जी दोबारा नहीं करोगे ।"
दो-चार दिन बीतने के बाद श्री जी साहिब जी ने पुनः बिहारी जी से विनती करी- "आप धारा भाई के विषय में कुछ विचार कीजिए । इसका गुनाह क्या है ? और जो दो महिलाएं उसके साथ हैं, उन्हें किस गुनाह के लिए आपने सुन्दरसाथ से निकाला है ? यदि धारा भाई ने गुनाह किया भी है, तो इसके लिए उसके परिवार के लोगों को समाज से क्यों निकालते हैं ? यह तो अत्याचार है । इससे सब दुःखी हैं ।"
बिहारी जी ने कहा- "मैंने तुम्हें पहले भी मना किया था । तुम सब मिलकर दोबारा धारा भाई के लिए अर्ज कर रहे हो । मैं उसके लिए कभी नहीं मानूंगा । यदि तुम लाख बार भी कहोगे, तो मेरा उत्तर यही होगा ।"
तब श्री जी साहिब जी से सब सुन्दरसाथ कहने लगे- "आप तो बिहारी जी का स्वभाव जानते हैं । आपको अपने लिए डरना चाहिए ।"
इस घटना के बाद श्री जी के मन का शक बढ़ गया कि बिहारी जी के ऊपर श्री राज की कृपा है या नहीं ?
जब बिहारी जी ने श्री जी की अलौकिक चर्चा का नूर देखा, तो उनके दिल में शक बैठ गया कि यह अवश्य मेरी गादी मुझसे ले लेंगे और यह बहुत महत्वपूर्ण बात है ।
फिर श्री जी और बिहारी जी एकान्त में बैठकर विचार-विमर्श करने लगे कि अब उन्हें क्या करना है, जिससे अन्य सुन्दरसाथ को ढूंढकर माया की निद्रा से जगाया जा सके ?
तब बिहारी जी ने कहा- "यह हमारा मार्ग नहीं है कि हम घर-परिवार छोड़कर विरक्तों जैसा कार्य करें । यदि तुम हलार देश में नहीं रह सकते, तो कच्छ में नौकरी कर लो । इसे मेरा हुक्म समझो ।"
श्री जी ने कहा- "मुझे श्री देवचन्द्र जी ने तारतम ज्ञान की निधि दी है, जिससे मेरे दिल में परमधाम की जाग्रत बुद्धि आ चुकी है । उसके बल पर जब मैं ऐसे राजाओं को प्रबोधूंगा, तो वे आपकी सेवा करेंगे और आपका हुक्म मानेंगे । अब मैं माया को नहीं पकड़ूंगा । जब मैंने चौदह लोकों को रद्द कर दिया, तो मैं माया का काम क्यों करूं ? सकुण्डल और सकुमार पर श्री देवचन्द्र जी की नजर थी । जब वे दोनों जाग्रत हो जायेंगे, तो ज्ञान का प्रकाश फैल जाएगा ।
"इसलिए हम दोनों को मिलकर बाहर निकलना चाहिए और श्री देवचन्द्र जी का ज्ञान सब जगह फैलाना चाहिए । संसार में जो इष्ट और पन्थ चल रहे हैं, इनका कोई मूल नहीं है । हमारा ज्ञान अखण्ड परमधाम का है और हमारे सिर पर साक्षात् अक्षरातीत खड़े हैं । हमें परमधाम के ज्ञान को पूरे संसार में फैलाना चाहिए ।
"आप अपने मन में कुछ संकोच न रखें । मैं आपको अटारी पर बैठाकर स्वयं नीचे आपकी सेवा में सावधान रहूंगा । सबके साथ चर्चा करके, मैं सबके प्रश्नों का उत्तर दूंगा । जब उसे परमधाम की पहचान हो जाएगी, तो उसे आपका दर्शन करने के लिए भेज दूंगा । इस प्रकार आपको साक्षात् धाम धनी मानकर मैं आपकी सेवा करूंगा ।"
तब बिहारी जी ने कहा- "मेरा तुम्हारे साथ निकलना नहीं हो सकता । मेरे साथ नागजी भाई की पत्नी रंगबाई भी है, जिसका भार बहुत अधिक है । रंगबाई की माता भी मेरे साथ हैं, और भी परिवार के बहुत लोग हैं । इसलिए मैं तुम्हारे साथ तो नहीं चल सकता । मूल स्वरूप श्री राज जिसको जगाना चाहेंगे, वह स्वयं आकर जुड़ जाएगा ।"
इस प्रकार की वार्ता प्रायः होती रहती थी ।
बिहारी जी ने जिन अन्य सुन्दरसाथ को निकाला था, उनको वापस लेने के लिए अर्जी होती रही, परन्तु उन्होंने एक भी अर्जी स्वीकार नहीं की ।
बिहारी जी को शक था कि रूपा बाई उनकी सेवा से परहेज करती है, इसलिए उनके दिल में रूपा बाई के लिए गुस्सा बैठ गया ।
इन सब घटनाओं के बाद श्री जी के दिल में यह विचार उपजा कि यदि बिहारी जी के अन्दर श्री राज का आवेश है, तो श्री जी का दिल इस बात को मानने को तैयार क्यों नहीं हो रहा है ? श्री जी ने इसे अपना अवगुण मानकर अपने चित्त को समझाया ।
नलिया से श्री जी और बिहारी जी के दिलों में अन्तर हो गया, परन्तु दोनों ने इस बात को एक-दूसरे से छिपा कर रखा ।
डेढ़ मास तक नलिया में रहने के पश्चात् सुन्दरसाथ ने प्रयाण किया । श्री जी सूरत के लिए निकल पड़े और बिहारी जी नवतनपुरी की ओर गए ।
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