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खम्भालिया के राजा से रक्षा

श्री प्राणनाथ लीलामृत - प्रसंग ५४

नलिया से चलकर श्री जी मंडई बन्दर (माण्डवी) आए । वहां सब सुन्दरसाथ एक बाग में जगह लेकर ठहरे ।

बिहारी जी खम्भालिया गए । वहां दज्जाल (माया) ने बहुत शोर किया । उसने विचार किया कि सुन्दरसाथ जाग्रत हो रहे हैं, सो उन्हें किसी प्रकार रोका जाए । उसके प्रभाव से एक व्यक्ति ने खम्भालिया के राजा को सावधान कर दिया कि श्री मेहेराज नाव से उसके राज्य में उतरेंगे ।

खम्भालिया का राजा श्री जी से बहुत वैर रखता था । सूचना मिलते ही उसने श्री जी को बन्दी बनाने के लिए सब जगह अपने सिपाहियों की चौकी बैठा दी ।

श्री बाई जी और सूरत के सुन्दरसाथ के साथ श्री जी नाव से जाने लगे । सभी लोग तो नाव पर चढ़ गए, परन्तु अन्त में जैसे ही श्री जी नाव पर चढ़ने लगे उन्हें छींक आ गई ।

तब श्री जी के मन में विचार उठा कि कहीं ये मूल स्वरूप का कोई संकेत तो नहीं है ? इसी शंका के कारण वे पीछे हट गए और उन्होंने किसी अन्य मार्ग से गन्तव्य तक जाने का निर्णय लिया ।

जब यहां से नाव चली, तो तेज हवा के प्रभाव से शीघ्र ही खम्भालिया पहुंच गई । खम्भालिया में श्री बाई जी सहित सब सुन्दरसाथ पकड़े गए ।

खम्भालिया के राजा ने उनसे बहुत पूछताछ करी, परन्तु श्री जी के विषय में कोई जानकारी प्राप्त नहीं कर सका । फिर दूसरे दिन उसने सभी सुन्दरसाथ को मुक्त कर दिया और वे सब सूरत के लिए चल पड़े ।

श्री जी साहिब जी विरक्त भेष में कच्छ के रण से होते हुए धोराजी पहुंचे । श्री तेज कुंवरी और सूरत के सुन्दरसाथ भी वहीं पर उनसे मिल गए ।

जब प्रेमजी और थावरजी ने यह बात सुनी कि श्री जी धोराजी में पधारे हैं, तो वे बैलगाड़ी लेकर दौड़े । मार्ग में ही उनकी श्री जी व सब सुन्दरसाथ से भेंट हो गई और उन्होंने उन सबको बैलगाड़ी पर बैठा लिया ।

बैलगाड़ी से यात्रा के दौरान श्री जी को किरंतन उतरा- "धोरीडा मा मूके तारी धूसरी ।"

इस किरन्तन में बैल की व्यथा के माध्यम से श्री जी ने अपने जीव की व्यथा व्यक्त की है कि कैसे गादीपति के अत्याचारों को सहते हुए भी उन्हें सुन्दरसाथ की जिम्मेदारी को दृढ़तापूर्वक निभाना है । इस किरंतन पर "मेहेराज" की छाप है ।

अब श्री जी घोघा (भावनगर) और सुहाली होते हुए सूरत पहुंच गए ।

सूरत में सैयदपुर में मोहन दास के यहां ठहरे । मोहन दास अमीन के घर श्री जी की बहुत जोरदार चर्चा हुई, जिसे देखकर दज्जाल (माया) शोर करने लगा ।

तब श्री जी सब सुन्दरसाथ को लेकर उनके बगल में स्थित शिवजी भाई के घर आ गए, जहां उनकी भली प्रकार से सेवा हुई ।

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