गोविन्द व्यास के ४० प्रश्नों का उत्तर
श्री प्राणनाथ लीलामृत - प्रसंग ५७
सूरत में वल्लभाचार्य मत के एक अनुयायी गोविन्द व्यास थे । उन्होंने श्री जी से मुख से भागवत की चर्चा सुनी ।
वल्लभाचार्य जी ने भागवत का टीका किया था, जो "सुबोधिनी टीका" के नाम से प्रसिद्ध है । इस टीका में उन्होंने अखण्ड ब्रज और रास का वर्णन किया है । साथ ही, उसमें इसी विषय पर आधारित ४० प्रश्न भी लिखे हैं ।
गोविन्द व्यास को इन ४० प्रश्नों का उत्तर नहीं आता था । उन्होंने श्री प्राणनाथ जी से इन प्रश्नों का उत्तर पूछा ।
तब श्री जी के कहने पर वल्लभ दलाल बहुत कठिनाई से उन प्रश्नों को प्राप्त करके लाए और श्री जी के हाथ में सौंप दिया ।
श्री जी ने स्वयं उन प्रश्नों का उत्तर न देकर, गोविन्द व्यास को ४० प्रश्नों पर चर्चा करने का हुक्म दिया । श्री प्राणनाथ जी की कृपा से गोविन्द व्यास स्वयं उन सभी प्रश्नों का उत्तर बोलते गए, जिस विषय पर पहले उन्हें संशय बना रहता था ।
इस घटना के बाद गोविन्द व्यास तुरन्त श्री जी के चरणों में नतमस्तक हो गए और तारतम लेकर सुन्दरसाथ में शामिल हो गए ।
जब इस प्रसंग के विषय में वल्लभाचार्य मत के लोगों को पता चला, तो वे दज्जाल (माया) के प्रभाव से श्री जी की निंदा करने लगे ।
इसी दौरान श्री जी को यह किरंतन उतरा- "वचन विचारो रे मीठड़ी, वल्लभाचारज बानी" ।
इस कीर्तन में वल्लभाचार्य जी की सुबोधिनी टीका की प्रशंसा करते हुए वैष्णवों को उसका अनुसरण करने का सिखापन दिया गया है ।
कुछ वैष्णव श्री जी के लिए भला-बुरा कहने लगे और किसी-किसी को उनके स्वरूप की पहचान हो गई । जब कोई निन्दक उनसे लड़ने की भावना से आता, तो उनका दर्शन पाते ही वह परमात्मा को धन्यवाद करता कि उसे ऐसा सौभाग्य मिला ।
सूरत में भगवान दास की सोहबत से माणिक भाई श्री जी का दर्शन करने के लिए आए । श्री जी की चर्चा सुनते ही माणिक भाई को उनके स्वरूप की पहचान हो गई ।
श्री जी १७ महीने तक सूरत में रहे । कलस गुजराती ग्रन्थ का अवतरण सूरत में पूर्ण हुआ । कलस को कतेब पक्ष में तौरेत भी कहा जाता है ।
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