श्री प्राणनाथ का सूरत से प्रस्थान
श्री प्राणनाथ लीलामृत - प्रसंग ६०
जिस प्रकार हज़रत मुहम्मद ने मदीना से कूच करके मक्का को जीता और दज्जाल को पराजित किया, उसी प्रकार अब आखिरी मुहम्मद श्री प्राणनाथ जी ने दज्जाल से युद्ध करने के लिए सूरत से प्रस्थान किया ।
ऐतिहासिक घटना के रूप में, श्री जी के साथ सैंकड़ों सुन्दरसाथ अपना घर-परिवार छोड़कर निकल पड़े । उनके साथ श्री बाई जी भी थीं ।
गोवर्धन भट्ट ने अपना तन और धन श्री जी और सुन्दरसाथ की सेवा में समर्पित कर दिया । इसके लिए वे समाज में धन्य-धन्य हुए ।
वेदान्त विद्वान भीम भाई अपना तन और सम्पूर्ण धन लेकर श्री जी के साथ निकल पड़े । उन्होंने सारा जीवन श्री जी की सेवा में न्यौछावर कर दिया और धनी के लिए प्रेम भरे वचन गाते रहे ।
नागजी भाई बहुत प्रेम भावना से श्री जी के साथ चल पड़े । उन्होंने अपने परिवार का त्याग कर दिया और तन-मन-धन सेवा में अर्पित कर दिया । श्री जी ने उन्हें गरीब दास के नाम की उपाधि दी ।
भीम भाई का साथी वेदान्ताचार्य श्याम भट्ट भी श्री जी के संग चला । वह कुछ दिन साथ रहकर वेदान्त के वचन सुनाता रहा, परन्तु बाद में अपने मन को वश में न रख सका और वापस लौट गया ।
नाहना भाई और पाखड़ी भाई भी श्री जी के साथ चल पड़े और उन्होंने आखिर तक उनका साथ निभाया । जिसका हाथ स्वयं धाम धनी ने पकड़ लिया हो, वह माया में नहीं रह सकता ।
कान्हजी भाई और रामजी भाई अपने पूरे परिवार के साथ श्री जी के संग चले और उन्होंने भी अन्त तक निभाया । उन दोनों ने अपना सब कुछ सेवा में न्यौछावर कर दिया ।
बिहारी जी की बहन यमुना बाई अपने परिवार को त्यागकर श्री जी के साथ चलीं और उन्होंने श्री जी को परब्रह्म मानकर बहुत स्नेह से सेवा करी । यमुना बाई के पुत्र छबीलदास भी सेवा का सुख लेने के लिए श्री जी के साथ चले ।
कुछ दिन तक धारा भाई भी साथ रहे और सुन्दरसाथ को पत्रियां पहुंचाने की सेवा करते रहे । फिर उन्हें वापस जाना पड़ा ।
लालदास जी की पत्नी लालबाई और उनकी पुत्री श्याम बाई भी साथ चलीं और श्री बाई जी की सेवा में लगी रहीं ।
लालदास जी खाली हाथ लेकर श्री जी के साथ चले और उन्होंने अन्त तक श्री जी का साथ निभाया ।
सूरत से शुकदेव और माणिक भाई श्री जी के पीछे-पीछे चले और मेड़ता में सुन्दरसाथ से मिल गए । इन्होंने अपना अहं श्री जी के चरणों में अर्पित कर दिया ।
प्रेमजी मार्ग में श्री जी से बहुत प्रेम भाव से मिले और इन्होंने सच्चे हृदय से श्री जी की सेवा करी ।
इस प्रकार, अज्ञानता का अन्धकार मिटाने के लिए, अनेक सुन्दरसाथ को साथ लेकर श्री प्राणनाथ जी सूरत से निकले और अहमदाबाद पहुंचे ।
लक्ष्मण भाई अपने परिवार के साथ अहमदाबाद में श्री जी से मिले । उनका परिवार बहुत बड़ा था और जिम्मेदारियां अधिक थीं, सो वे अहमदाबाद में ही बस गए । पूरा जीवन माया में बिताने के बाद अन्तिम समय में उन्होंने अपनी सुरता श्री राज की तरफ की ।
अहमदाबाद में चार दिन रहकर श्री जी सिद्धपुर पहुंचे ।
अगला प्रसंग- सिद्धपुर में केशवदास की जागनी
