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सिद्धपुर में केशवदास की जागनी

श्री प्राणनाथ लीलामृत - प्रसंग ६१

सिद्धपुर में श्री प्राणनाथ जी २२ दिन रहे ।

वहां भगवान उपाध्याय (रेवादास) नामक पण्डे ने उनकी बहुत सेवा करी । उसे एक मोहर दे दी गई । फिर वह अधिक धन पाने के लालच में पालनपुर तक उनके साथ चलता रहा । उसे श्री जी के स्वरूप की कुछ पहचान नहीं थी ।

गोवर्धन जी ने श्री जी की तरफ संकेत करते हुए भगवान उपाध्याय से कहा- "तुम इनके स्वरूप की पहचान करो और इनसे अलौकिक धन मांगो ।"

तब भगवान उपाध्याय श्री जी के चरणों में गिर पड़ा और कहने लगा- "मेरी परात्म को पहचान कर, मेरी आत्मा को जगा दीजिए ।"

श्री जी ने संक्षेप में उसे बता दिया- "उस परमधाम को याद करो जिसमें यमुना जी, सात घाट, हौज कौसर, और अक्षरधाम है । हम ब्रज और रास में आए थे, अब इस तीसरे ब्रह्माण्ड में माया का खेल देखने आए हैं । खेल देखकर हम वापस परमधाम चले जाएंगे ।"

इन बातों को अपने चित्त में धरकर भगवान उपाध्याय अपने घर लौट आया । छह महीने तक उसने वह बात किसी से नहीं कही । उसका केशव भट्ट से परिचय था ।

एक दिन उसने केशव भट्ट से कहा- "छह महीने पहले एक क्षत्रिय यहां से निकले थे, जिन्होंने मुझे अलौकिक ज्ञान के कुछ शब्द कहे थे ।"

केशव भट्ट ने कहा- "वह बात मुझे भी सुनाओ ।"

जब भगवान उपाध्याय ने वही शब्द दोहराए, तो उन्हें सुनकर केशव भट्ट बोले- "अब मैं तुमसे क्या कहूं ? वे तो अक्षरातीत थे, जिन्हें तुम पहचान नहीं सके । अब मुझे ईमान आ गया है और मैं उनके चरणों में जा रहा हूं ।"

केशव भट्ट उसी अवस्था में वहां से निकल पड़े और श्री जी को सब तरफ ढूंढने लगे । श्री जी को खोजते-खोजते वे दिल्ली तक पहुंच गए ।

दिल्ली में रामचन्द्र पंसारी से केशव जी को श्री जी का पता चला और लाल दरवाजे पर वे अति आतुर होकर श्री जी से मिले ।

कुछ दिन तक केशव जी दिल्ली में श्री जी के चरणों में रहे और उनके मुख से चर्चा सुनते रहे । उन्होंने तारतम ज्ञान को अच्छी तरह समझा और उन्हें श्री जी के स्वरूप की बहुत पहचान हो गई ।

तब केशव जी वापस सिद्धपुर आ गए और दज्जाल (अज्ञानता) से लड़ने के लिए कमर कस ली । उन्होंने सुन्दरसाथ को माया से निकालने के लिए बहुत जोर लगाया ।

केशव भट्ट ने रेवादास को उपदेश देकर सुन्दरसाथ में शामिल किया । इसके बाद उन्होंने केशव (दूसरे), द्वारका दास, त्रीकम, गंगादास, विट्ठल भाई को प्रबोधा और वे सब गृह त्यागकर श्री जी के चरणों में दिल्ली चले गए ।

सिद्धपुर में केशव भट्ट ने अपने घर पर तारतम ज्ञान के प्रचार का केन्द्र बना लिया और वे नित्य परमधाम की चर्चा करने लगे ।

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