मेड़ता की बीतक
श्री प्राणनाथ लीलामृत - प्रसंग ६२
सिद्धपुर से चलकर श्री प्राणनाथ और सब सुन्दरसाथ मेड़ता पहुंचे ।
मेड़ता में श्री जी की लाभानन्द यति से दस दिन तक चर्चा होती रही । जब श्री जी के प्रश्नों के आगे वह बार-बार निरुत्तर होता रहा, तो उसे चिन्ता होने लगी कि इससे तो उसका महत्व ही समाप्त हो जाएगा ।
अब लाभानन्द यति ने श्री जी को मार्ग से हटाने के लिए तामसिक मार्ग अपनाया । उसने तान्त्रिक मन्त्रों के माध्यम से दैत्यों को श्री जी पर पहाड़ गिराने के लिए भेजा जिससे वे पहाड़ के नीचे दब जाएं, परन्तु उसके द्वारा भेजे गए दैत्यों से पहाड़ उठा ही नहीं । इस प्रकार उसने भांति-भांति के उपाय किए, परन्तु कोई भी साधन काम नहीं आया । अन्त में, वह निराश होकर बैठ गया ।
जहां साक्षात् अक्षर की पंच वासनाएं तथा सभी देव रक्षा करने के लिए खड़े हों, वहां तान्त्रिक मन्त्रों का असर कैसे हो सकता है ?
जब कुछ भी जोर नहीं चला, तो लाभानन्द यति ने मौन धारण कर लिया ।
मेड़ता में एक हवेली लेकर श्री प्राणनाथ विराजमान हो गए । वहां बहुत प्रभावशाली चर्चा होने लगी ।
यहां रामचन्द्र आकर सुन्दरसाथ में शामिल हुए और धाम धनी की सेवा में जुट गए ।
मेड़ता में चर्चा का शोर मच गया और बहुत लोग श्री जी की चर्चा सुनने व दर्शन करने के लिए आने लगे । जिस प्रकार मधुमक्खियां शहद के छत्ते को घेर लेती हैं, उसी प्रकार लोगों ने श्री जी को घेर रखा था ।
चांपसी और रघुनाथ पूरे चित्त से श्री जी की चर्चा सुनने आते थे । उन्होंने अपने परिवार का त्याग कर दिया और श्री जी के साथ चल पड़े ।
राजा राम अग्रवाल मेड़ता के बड़े व्यापारी थे । उन्होंने श्री जी एवं सुन्दरसाथ को रसोई की सेवा के लिए अपने घर पर बुलाया । उनकी पुत्री ललिता ने अपनी आत्मा को श्री जी के चरणों में पूरी तरह अर्पित कर दिया । उसका समर्पण देखकर श्री जी को एक किरंतन उतरा, जिसमें ललिता की छाप है- "वारी रे वारी मेरे प्यारे ।"
राजा राम अपने पूरे परिवार के साथ सुन्दरसाथ में शामिल हो गए और उन्होंने सभी सुन्दरसाथ का पूरा खर्च अपने ऊपर ले लिया । यह सेवा उन्होंने श्री जी के पन्ना पहुंचने तक कई वर्ष निभाई ।
झांझन भाई भी अपने पूरे परिवार के साथ तारतम लेकर सुन्दरसाथ में शामिल हो गए । परमधाम पर अटूट श्रद्धा रखते हुए उन्होंने परमात्मा को पा लिया ।
इसी तरह मेड़ता में जुड़ने वाले अन्य सुन्दरसाथ के नाम हैं- मकरन्द भाई, मानसिंह भाई, मोहन भाई, मनोहर, सादल, नन्दराम, ऋषेश्वर, जीवनदास, लक्ष्मी बाई, रम्भा बाई, जादी, कुसली, चांद बाई, मोज बाई, भाग बाई, तेज बाई, अनूपो, राधा, बेन बाई, मुरलीधर, मना बाई ।
यह सभी सुन्दरसाथ श्री जी के मुख से चर्चा सुनने आते थे और ब्रह्ममुनियों की महिमा सुनकर उन्हें बहुत प्रसन्नता होती थी । इन सब सुन्दरसाथ में राजा राम प्रमुख थे, जो तारतम ज्ञान से भली प्रकार जाग्रत हो चुके थे ।
रास की कुछ रामतों का अवतरण मेड़ता में भी हुआ । रास से सम्बन्धित यह किरंतन भी वहीं उतरा- "स्यामाजी स्याम के संग ।"
जब श्री प्राणनाथ जी ने राजा जसवन्त सिंह की वीरता के विषय में सुना, तो उन्हें प्रबोधित करने के लिए दो बार पाती लिखी जिसे लेकर गोवर्धन भट्ट गए । गोवर्धन जी ने अटक नदी पार करके उन्हें सन्देश पहुंचाया, परन्तु परमधाम का अंकुर (आत्मा) न होने के कारण जसवन्त सिंह ने रुचि नहीं दिखाई ।
मेड़ता में श्री जी चार मास तक रहे ।
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