दिल्ली में जुड़ने वाले सुन्दरसाथ
श्री प्राणनाथ लीलामृत - प्रसंग ६६
लाल दरवाजे पर क्षत्रिय की हवेली में ऊपर अटारी पर एकान्त स्थान पर बैठकर श्री जी साहिब जी वेद-वेदान्त की चर्चा करते थे । एक सूफी भी नित्य चर्चा सुनने आता था और उसे चर्चा बहुत अच्छी लगती थी ।
नैनसुख भाई चर्चा में दयाराम को लेकर आए । दयाराम के अन्दर परमधाम की आत्मा थी और वे सबके देखते-देखते श्री जी पर ईमान ले आए । दयाराम को जो सुख प्राप्त हुआ, उसे शब्दों में वर्णन नहीं किया जा सकता ।
दयाराम ने चंचल को सब कुछ बताया । चंचल भी शीघ्र श्री जी पर ईमान ले आए और उन्हें बहुत शान्ति मिली ।
मलूक चन्द्र ने दज्जाल से लड़ाई में श्री जी का पूरा साथ दिया और पूरी तरह से अपनी आत्मा को उन पर समर्पित कर दिया ।
श्री जी की चर्चा सुनकर शेखबदल ने उनके चरणों को ग्रहण किया और दज्जाल से सीधी लड़ाई लड़ी । अनन्तराम भी लड़ाई के समय आकर श्री जी से मिले और सेवा में शामिल हो गए ।
हरिप्रसाद और हरिकरण दो भाई थे, जो बड़े प्रेम से छिपकर श्री जी की चर्चा सुनते थे । वे पूरी तरह श्री जी पर समर्पित थे, परन्तु अपने परिवार के बड़ों से डरते थे ।
भिखारी दास ने श्री जी की थोड़ी चर्चा सुनी । उन्हें सिर्फ ऊपर की पहचान थी और उसी भाव से उन्होंने श्री जी व सर्व सुन्दरसाथ को अपने घर पधराकर प्रसन्नता से सबको भोजन कराया ।
गंगाराम श्री जी के चरणों में कभी भी खाली हाथ नहीं आते थे । उन्हें बाजार में जो भी भली वस्तु मिलती, उसे क्रय करके श्री जी के समक्ष रख देते ।
इसी प्रकार दयाराम भी जब आते, तो नए-नए तरह के मिठाई, पकवान, मेवे, आदि लेकर आते । उनके दिल में श्री जी के प्रति पक्का ईमान था ।
चंचल अंग में उमंग भरकर श्री जी के लिए अपनी ही दुकान से चोरी करके प्रतिदिन कुछ भेंट अवश्य लाते । उनके परिवार के लोग उनसे झगड़ा करते और श्री जी के पास जाने से रोकते थे, परन्तु उन्होंने किसी की परवाह नहीं की ।
रामचन्द्र पंसारी ने श्री जी साहिब जी के स्वरूप की ऊपरी पहचान करी और उसी के अनुसार उनकी सेवा करी ।
जेठा महाजन एक वेदान्ती थे, जो चर्चा सुनने आते थे । उन्हें चर्चा समझ भी आती थी, परन्तु वे निराकार की पूजा नहीं छोड़ सके ।
अब श्री जी विचार करने लगे कि सुल्तान को अपना सन्देश कैसे सुनाया जाए ? तब यह बात सबको अच्छी लगी कि किसी सुरक्षित स्थान पर रहते हुए ही इन कट्टरपंथियों को सन्देश भेजना उचित होगा ।
ऐसा विचार करके श्री जी ने कुछ सुन्दरसाथ को दिल्ली में रख दिया और शेष सबको लेकर शाहजहांपुर बूड़िया (यमुनानगर) पहुंच गए । उन सुन्दरसाथ से कह दिया गया कि श्री जी उस स्थान से ही उनकी सूचना लेते रहेंगे ।
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