शाहजहांपुर बूड़िया का वृत्तान्त
श्री प्राणनाथ लीलामृत - प्रसंग ६७
जब श्री जी साहिब जी सुन्दरसाथ को लेकर शाहजहांपुर बूड़िया (यमुनानगर) पहुंचे, तब आजूज-माजूज (महामारी) ने बहुत शोर किया । इस समय सुन्दरसाथ में मिर्गी की बीमारी फैल गई ।
नागजी भाई को भी मिर्गी ने पकड़ लिया । जब वे मृत्यु के निकट पहुंच गए, तब श्री जी ने उन्हें अपना जोश देकर परमधाम का दर्शन करा दिया और काल को मार गिराया । श्री जी की कृपा से ही उनका जीवन बच सका ।
यहां के सिरदार एक क्षत्रिय थे, जिन्होंने श्री जी के स्वरूप की ऊपरी पहचान की थी । उन्होंने उसी भावना से श्री जी की सेवा की, परन्तु कुछ भी ज्ञान लाभ नहीं ले सके ।
अब श्री जी ने निर्मल दास को चार सुन्दरसाथ के साथ खड़कारी के राजा को जाग्रत करने के लिए भेजा । जब वह किसी प्रकार से जाग्रत नहीं हुआ, तो दस-ग्यारह दिन वहां रहकर पांचों सुन्दरसाथ वापस लौट आए ।
श्री जी ने सद्गुरु श्री देवचन्द्र जी के वचनों को याद किया कि सकुण्डल और सकुमार की जागनी उन्हें करनी है । अतः उन्होंने २२ प्रश्नों वाली पाती का फारसी भाषा में अनुवाद करवाया । लालदास जी व भीम भाई को वह सन्देश लेकर दिल्ली में औरंगज़ेब तक पहुंचाने को कहा ।
लालदास जी और भीम भाई ने श्री जी का हुक्म अपने सिर चढ़ाया और बूड़िया से चलकर दिल्ली पहुंच गए ।
उन दोनों के जाने के बाद श्री जी को जिब्रील फरिश्ते ने यह प्रेरणा दी कि यह जो सन्देश भेजा है, यह काम सफल नहीं होएगा । अब श्री जी ने कान्हजी भाई को उनके पीछे भेजा, जो उनसे दिल्ली में मिले ।
कान्हजी भाई ने उन्हें श्री जी का सन्देश सुनाया- "आपको पैगाम देने का जो हुक्म हुआ था, उसे मैं रद्द करता हूं । अभी औरंगज़ेब आपकी बात नहीं सुनेगा और वह आपको क्षति भी पहुंचा सकता है। जब मैं वहां आऊंगा, तब परिस्थिति अनुसार विचार करेंगे कि क्या करना है ।"
शाहजहांपुर बूड़िया में एक मास तक रहने के पश्चात् श्री जी हरिद्वार के लिए निकल पड़े ।
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