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हरिद्वार का महाकुम्भ

श्री प्राणनाथ लीलामृत - प्रसंग ६८

जब शालिवाहन शाका के १६०० वर्ष पूर्ण हो चुके थे और विक्रम सम्वत् १७३५ पूरा हो गया था, तब ईश्वरों के ईश्वर श्री प्राणनाथ जी का सभी सम्प्रदाय के आचार्यों के साथ हरिद्वार में शास्त्रार्थ हुआ ।

उस समय हरिद्वार में महाकुम्भ का मेला लगा था, जिसमें वैष्णव के चार सम्प्रदाय, षट दर्शन के आचार्य, और दस नाम सन्यासी आए हुए थे । वहां चारों वर्ण और चारों आश्रम के अनेक लोगों का समागम हुआ था ।

जब उन लोगों ने श्री प्राणनाथ जी को देखा, तो उनके मन में शंका हुई और उन्होंने पूछा- "आपका कोई नया मार्ग लगता है, जिसके बारे में न तो हमने सुना है, न ही कहीं देखा है । कृपया अपना परिचय दीजिए, आप हमारे सनातन मार्ग के नहीं लगते ।"

तब श्री जी ने उत्तर दिया- "आपका पन्थ प्राचीन है, इसलिए मुझे अपने इष्ट और धर्म के विषय में विस्तार से बताइए । मुझे वेद-शास्त्रों के प्रमाण के साथ अच्छी तरह समझाइए, जिससे मैं उसे ग्रहण कर सकूं । आप अपने सिद्धान्तों के विषय में भी बताइए और यदि मुझे कोई संशय होता है तो उसका निवारण कीजिए ।"

अब सभी आचार्यगण एक-एक करके अपनी पद्धति के विषय में श्री जी को बताने लगे ।

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