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रामानुज सम्प्रदाय के आचार्यों से वार्ता

श्री प्राणनाथ लीलामृत - प्रसंग ६९

सबसे पहले रामानुज सम्प्रदाय के आचार्य बोले-

"हम अपनी पद्धति के अनुसार अपने शास्त्र, वेद, मत, इष्ट, आदि के बारे में बताते हैं । हमारा पन्थ अगोचर (बाह्य दृष्टि से परे) है ।

"हमारे सम्प्रदाय में परमात्मा के नाम की माला को हृदय में माना जाता है । हमारा गोत्र अच्युत है । हमारी शाखा अनन्त प्रभु हैं । हमारा वर्ण शुक्ल है । हम सामवेद और सामीप्य मुक्ति को मानते हैं ।

"हमारा मठ वैकुण्ठ है । हम सुमेरु पर्वत की प्रदक्षिणा करते हैं । हमारा बीज मन्त्र निराकार है । हम ब्रह्म को आकाश के समान व्यापक मानते हैं । हमारा क्षेत्र पद्मनाभ है तथा सुख-विलास का स्थान मेल कोटा है । हमारी इष्ट लक्ष्मी हैं, जिनसे यह पद्धति चली है ।

"हमारा अखाड़ा वैकुण्ठ है, जो चौदह लोकों के शीर्ष पर स्थित है । हमारा धाम रंगनाथ है । हमारा तीर्थ कावेरी नदी है । हमारी देवी कमला (लक्ष्मी) हैं, जो सारी मनोकामनाएं पूर्ण करती हैं ।

"हमारे देवता नारायण हैं । हमारे आचार्य भगवान विष्णु हैं । हम अलख निरंजन गायत्री को मानते हैं । यह रामानुज सम्प्रदाय की पद्धति है ।"

इस पद्धति को सुनकर श्री प्राणनाथ जी ने प्रश्न किया- "आपने तो सारी बातें इस नश्वर जगत की कही हैं । वेद कहते हैं कि महाप्रलय में पिण्ड (शरीर) और ब्रह्माण्ड (जगत) का नाश हो जाता है, तब जीव कहां रहता है ?"

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