न्याय दर्शन के आचार्यों से संवाद
श्री प्राणनाथ लीलामृत - प्रसंग ७५
हरिद्वार में न्याय दर्शन के आचार्यों ने श्री प्राणनाथ जी से कहा-
"न्याय दर्शन की विधि भेद के सिद्धान्त पर आधारित है । हमारी मान्यता है कि माया, जीव, ईश्वर - ये तीनों एक दूसरे से भिन्न हैं और अनादि हैं ।
"दुःख की २१ प्रणालिका (सीढ़ी) हैं । जब उनका नाश होता है, तब सुख की प्राप्ति होती है ।"
तब श्री जी ने उनसे प्रश्न किया-
"आपमें विचार नहीं है । आपके वचनों के अनुसार तो ईश्वर और जीव का विनाश हो जाता है । जब आप दुःख की २१ सीढ़ियां बता रहे हैं जिसमें माया और जीव का वास है, तो बताइए कि सुख की सीढ़ियां कौन सी हैं ?
"आप सूक्ष्म स्वरूप को नित्य (अखण्ड) और स्थूल का नाश कहते हैं । जब २१ सीढ़ियों (स्थूल) का नाश हो जाता है, तब नित्य कहां रहता है ?"
श्री जी का प्रश्न सुनकर आचार्यगण मौन हो गए ।
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