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मीमांसा दर्शन के आचार्यों से वार्ता

श्री प्राणनाथ लीलामृत - प्रसंग ७६

मीमांसा दर्शन के आचार्य श्री प्राणनाथ जी से बोले-

"हमारी मान्यतानुसार कर्म ही प्रधान है । कर्म से ही कारण और कर्ता हैं । कर्म ही हमारा इष्ट है । जीव, ईश्वर, ब्रह्म - सब कर्म के रूप हैं । कर्म के बिना और कुछ नहीं है । कर्म अखण्ड, अनादि और अनूप है ।"

तब श्री जी ने प्रश्न किया-

"कर्म भ्रान्ति का विषय है, जबकि ब्रह्म का स्वरूप तो अखण्ड और एकरस है । कर्म में स्थिरता नहीं होती, वह बनता (प्रारम्भ) और मिटता (अन्त) है ।

"कर्म की उत्पत्ति अहंकार और मन के मिलने से होती है । अहंकार और मन जीव में होते हैं, तभी वह कर्ता कहलाता है । जब ब्रह्म तक मन पहुंच ही नहीं सकता, तो ब्रह्म में कर्म कैसे हो सकता है ?

"वेद-शास्त्र में कहा गया है कि ब्रह्म का स्वरूप माया से पूर्णतः रहित है । फिर भी आप लोग व्यर्थ में खींच-तान करते हैं ।"

श्री जी की बातें सुनकर मीमांसा दर्शन के आचार्य मौन हो गए ।

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