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सांख्य दर्शन के आचार्यों से संवाद

श्री प्राणनाथ लीलामृत - प्रसंग ७७

इसके पश्चात् सांख्य दर्शन के आचार्यों ने श्री प्राणनाथ जी के समक्ष अपने विचार रखे-

"पुरुष और प्रकृति इस जगत से परे हैं और वही सबके कारण रूप हैं । जब पुरुष और प्रकृति मिलते हैं, तब जगत की उत्पत्ति होती है । जब पुरुष और प्रकृति अलग हो जाते हैं, तब जगत मिट जाता है । यह हमारा मत है ।"

उनके विचार सुनकर श्री जी ने पूछा-

"आप कहते हैं कि पुरुष और प्रकृति से इस जगत की उत्पत्ति हुई है, तो इससे यह सन्देह होता है कि सूर्य की उपस्थिति में अन्धकार कैसे रह सकता है ?

"जब महाप्रलय होती है, तब पुरुष-प्रकृति तक सब जगत का लय हो जाता है । जब प्रकृति का रूप ही नहीं रह जाता, तो पुरुष और प्रकृति का मिलन कहां और कैसे होता है ?

"कृपया यह रहस्य समझाइए कि पुरुष और प्रकृति का रूप साकार है या निराकार है ? यदि आप अपनी बुद्धि से पुरुष-प्रकृति को निराकार कहते हैं, तब तो उन दोनों में कोई भेद ही नहीं रह जाएगा, फिर उनका मिलन कैसे होता है ?"

श्री जी के प्रश्नों को सुनकर सांख्य दर्शन के आचार्य मौन हो गए ।

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