वैशेषिक दर्शन के आचार्यों से वार्ता
श्री प्राणनाथ लीलामृत - प्रसंग ७८
तद्पश्चात् वैशेषिक दर्शन के आचार्यों ने श्री प्राणनाथ जी से कहा-
"हमारे मत में काल ही सारे जगत का मूल है । काल से ही जगत की उत्पत्ति होती है, काल ही सबका संचालन करता है, और काल ही सबका नाश करता है । काल में ही ब्रह्म का वास है ।"
यह सुनकर श्री जी ने उनसे प्रश्न किए-
"आप कहते हैं कि काल ही सबका मूल है, जबकि वेद तथा स्मृति में तो लिखा है कि काल नश्वर है और जहां ब्रह्म का प्रकाश है वहां काल नहीं पहुंच सकता ?
"आप कहते हैं कि काल से ही सब कुछ उत्पन्न और उसी में लीन होता है, जबकि ब्रह्म में न तो उत्पत्ति होती है न ही लय होता है ?
"ब्रह्म का निज स्वरूप सबसे परे है, जबकि उनकी सत्ता सबमें समायी हुई है । ग्रन्थों में ब्रह्म के विषय में ऐसा ही वर्णन किया गया है, परन्तु आपने तो उन्हें सबलिक का स्वाप्निक स्वरूप आदिनारायण मान लिया जो इस माया (नश्वर जगत) में रहते हैं । वास्तव में, ब्रह्म निर्विकार है और इस जगत से परे है ।
"वेद में ऐसा कहा गया है कि जो कुछ काल के अधीन है, वह ब्रह्म नहीं है । आप काल को निराकार मानते हैं, इसीलिए भूलवश ब्रह्म का रूप भी वैसा ही मान लेते हैं ।"
श्री जी की बातें सुनकर वैशेषिक दर्शन के आचार्य मौन हो गए ।
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