वेदान्त दर्शन के आचार्यों से शास्त्रार्थ
श्री प्राणनाथ लीलामृत - प्रसंग ८०
इसके पश्चात् श्री प्राणनाथ जी से वेदान्त दर्शन के आचार्य बोले-
"माया (जगत) में ब्रह्म व्यापक है, अर्थात् वह कण-कण में विद्यमान है । ब्रह्म सर्वदेशीय है और सर्व योग्य है । जो ब्रह्म के अतिरिक्त किसी को देखता है उसे हम अज्ञानी मानते हैं, अर्थात् ब्रह्म के बिना कुछ नहीं है ।
"सूक्ष्म अणु से लेकर दीर्घकाय हाथी तक सबके अन्दर एक ही ब्रह्म विद्यमान है । वह सबसे श्रेष्ठ है और समस्त लौकिक इच्छाओं से रहित है । उसे कर्म करने या सोचने-विचारने की भी आवश्यकता नहीं पड़ती ।"
इन कथनों को सुनकर श्री जी ने पूछा-
"जब आप ब्रह्म को सर्वत्र व्यापक मानते हैं, तब तो अज्ञान होना ही नहीं चाहिए । फिर छह शास्त्रों की रचना क्यों हुई ?
"आप कहते हैं कि ब्रह्म निराकार है तथा सबके अन्दर विराजमान है । यदि वह इच्छा से रहित है, तो फिर यह जगत किससे प्रकट होता है ?
"ब्रह्म में माया का प्रवेश तीनों काल में कभी नहीं हो सकता, तो फिर आप किस प्रकार माया को ब्रह्म में विद्यमान कहते हैं तथा किस प्रकार ब्रह्म को सर्वत्र व्यापक कहते हैं ?
"आप माया को अनादि कहते हैं, तो वह अनादि कैसे है ? पुनः यह भी समझाइए कि वह निराकार है या साकार है ?
"शंकराचार्य ने कहा है कि आत्मा इस जगत से भिन्न है । फिर आप यह कहते हैं कि आत्मा सबके अन्दर विद्यमान है । यह दोनों विपरीत बातें कैसे सम्भव हैं ?"
वेदान्त के आचार्यों से बहुत वाद-विवाद हुआ । उसे कहां तक लिखा जाए ।
छह दर्शन के आचार्यों के अलग-अलग विचार श्री प्राणनाथ जी ने सुने ।
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