श्री जी से प्रश्नोत्तर
श्री प्राणनाथ लीलामृत - प्रसंग ८१
हरिद्वार के उस महाकुम्भ में, जब सभी मत के आचार्य अपने ज्ञान से श्री प्राणनाथ जी को प्रभावित करने में असफल हो गए, तब उन्होंने एकसाथ मिलकर श्री जी से कहा- "आप अपने मत के विषय में शास्त्रों के प्रमाण के साथ बताएं ।"
तब श्री जी ने उत्तर दिया-
"हे सन्त जनों ! आप विरोध छोड़कर मेरी बात सुनिए । हरिवंश पुराण में वेद व्यास ने राजा जनमेजय से कहा- 'अनहोनी घटना के रूप में ब्रह्म रूप मुनि प्रकट होने वाले हैं ।'
"तब राजा जनमेजय ने व्यास जी से पूछा- 'सनकादिक से लेकर आप तक बहुत ऋषि हुए हैं, क्या आप में से कोई ब्रह्म रूप नहीं हुआ ?'
"व्यास जी ने राजा से कहा- 'ब्रह्म रूप मुनि इससे पहले कभी नहीं हुए । वे शीघ्र ही कलियुग में प्रकट होने वाले हैं । वे उत्तम पुरुष अक्षरातीत के बिना अन्य किसी देवी-देवता की उपासना नहीं करेंगे । वे ऐसा नूतन ज्ञान सुनाएंगे, जिसे आज तक किसी ने नहीं कहा । उनकी बात सुनकर जगत के लोग उनकी पूजा करेंगे ।'"
श्लोक- उक्तम् च हरिवंशे भविष्योत्तर । अभाविनो भविष्यन्ति मुनयो ब्रह्मरूपेणः । उत्पन्ना ये कलौयुगे प्रधान पुरुषाश्रयाः ॥ कथायोगेन तान्सर्वान् पूजयिष्यन्ति मानवाः । यस्य पूजा प्रभावेन जीव सृष्टि उद्धारणम् ॥ (हरिवंश पुराण, भविष्य पर्व ४/२१,२२)
अर्थ- हरिवंश पुराण के भविष्य पर्व में कहा गया है कि प्रधान पुरुष के आश्रय में रहने वाले ब्रह्म रूपी मुनि कलियुग में प्रकट होंगे, जो इससे पहले जगत में कभी नहीं आए । उनके ज्ञान को सुनकर सभी मानव उनकी पूजा करेंगे और उस पूजा के प्रभाव से जीव सृष्टि का उद्धार होगा (अखण्ड मुक्ति मिलेगी) ।
"इस प्रकार अठारह पुराण और भविष्य ग्रन्थों में ब्रह्ममुनियों के आने की बात लिखी हुई है । आपमें से जो भी इस अलौकिक ज्ञान का इच्छुक हो, वह अपना चित्त एकाग्र करके इसे ग्रहण करे ।"
श्री जी का उत्तर सुनकर सब आचार्यों ने सोचा कि ये तो किसी भी तरह से बन्ध नहीं रहे हैं । जब हम इनसे इनका धाम, क्षेत्र, सम्प्रदाय, आदि पूछेंगे, तब इन्हें कोई उत्तर नहीं आएगा ।
तब सभी आचार्यों ने मिलकर बड़े गर्व के साथ श्री जी से अनेक प्रश्न पूछे-
"हे स्वामी जी ! जिस प्रकार हम सबने अपने सम्प्रदाय की पद्धति कही, उसी प्रकार आप भी प्रसन्नता से अपने सम्प्रदाय की पद्धति साक्षी के साथ बताइए ।
"आप अपनी शाखा, शिखा, सूत्र, आराध्य, गोत्र, इष्ट, जप, साधन, मन्त्र, पुरी, देवी, शाला, क्षेत्र, सुख-विलास का स्थान, ऋषि, देव, तीर्थ, शास्त्र, ज्ञान, कुल, फल, द्वार (मार्ग), मूल स्थान, सम्प्रदाय, आदि के विषय में विस्तार से बताइए ।"
इस प्रकार आचार्यों ने श्री जी से लगभग २४ प्रश्न पूछे ।
तब कृपा सिन्धु श्री प्राणनाथ जी ने कहा-
"हे साधु जन ! आप सब मेरी बात सुनिए । मैं आपके एक-एक प्रश्न का उत्तर दूंगा । यह ज्ञान अकथनीय और अद्भुत है । मैं श्रुति और स्मृति की साक्षी देकर आपसे कहता हूं । आप सब इसे चित्त देकर सुनिए और अपने हृदय में इसका विचार करिए ।"
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