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शेख सुलेमान को पैगाम

श्री प्राणनाथ लीलामृत - प्रसंग ८३

हरिद्वार से लौटकर, दिल्ली में श्री जी साहिब जी सीधा दाऊ पाण्डे की हवेली में गए जहां वे सुन्दरसाथ को छोड़ गए थे । उस समय गरीबदास सब सुन्दरसाथ की सेवा में रहते थे, तो श्री जी ने प्यार से उन्हें "खानसामा" की उपाधि दे दी ।

औरंगज़ेब तक सन्देश पहुंचाने के लिए यह निर्णय लिया गया के सबसे पहले महिलाओं, बच्चों और वृद्धों को दिल्ली से दूर किसी सुरक्षित स्थान पर रख दिया जाए । इस अभियान के लिए सिर्फ पुरुषों को दिल्ली में रखा जाए ।

तब सब सुन्दरसाथ को अनूपशहर (बुलन्दशहर) में एक हवेली लेकर ठहरा दिया गया । अनूपशहर का चौधरी एक पाठक था, जो दो दिन तक श्री जी का दर्शन करने आया और उसने चर्चा भी सुनी । उसे सिर्फ कुछ ऊपरी पहचान हो सकी और वह भेंटस्वरूप श्री जी के लिए गुलाब के इत्र की एक बोतल दे गया ।

सुन्दरसाथ को अनूपशहर छोड़कर श्री जी दिल्ली में शाहगंज में ठहरे । वहां से उन्होंने बिहारी जी को एक पत्र में अब तक की सारी घटनाओं का विवरण लिखकर भिजवा दिया ।

फिर यहां से चलकर श्री जी लाल दरवाजे आ गए और सब सुन्दरसाथ ने मिलकर विचार-विमर्श किया कि कैसे औरंगज़ेब तक अपनी बात पहुंचाई जाए ?

श्री जी ने आशाजीत वकील को बुलाकर वह पत्र सुनवाया । उस पत्र में नबी (रसूल मुहम्मद) और नारायण की पहचान बताई गई थी । यह सुनकर आशाजीत का ईमान डगमगा गया ।

आशाजीत कहने लगा- "आपके पत्र से तो हिन्दुओं की कुछ भी गरिमा नहीं रह जाएगी । मैंने बिना सिर के आदमी (हमेशा मरने के लिए तैयार) के विषय में सुना था और आज आपके रूप में देख भी लिया । औरंगज़ेब और शरीयत के कट्टरपंथी शासन से आप लड़ना चाहते हैं, यह देखकर मेरा मन बेचैन हो रहा है ।"

तब सुन्दरसाथ ने आपस में विमर्श करके आशाजीत का साथ छोड़ दिया । फिर सभी विचार करने लगे कि औरंगज़ेब के किसी नजदीकी व्यक्ति से भेंट करके अपनी बात बताई जाए ।

इसी भावना से कुछ सुन्दरसाथ शेख सुलेमान से मिले और उसे सुल्तान से मिलवाने के लिए कहा । शेख सुलेमान दो बार श्री जी से भेंट कर चुका था और वह औरंगज़ेब से मिलवाने के मूल्य स्वरूप कीमिया (लोहे को सोना बनाने की विधि) चाहता था ।

सुन्दरसाथ ने शेख सुलेमान को समझाया- "हमें पहाड़ पर बैठे एक फकीर ने भेजा है । यदि आप हमारा कार्य कर दें, तो आपके मन की सारी इच्छाएं पूरी करवा देंगे । औरंगज़ेब से बात करके जब देश में एक दीन (धर्म) हो जाएगा, तब सबका विरोध और लड़ाई-झगड़ा समाप्त हो जाएगा । आपके सारे दुश्मन स्वयं शर्मिन्दा होंगे और आपका मान बढ़ेगा । और जितने कीमियागर (लोहे को सोना बनाने वाले) हैं, वे भी आपके अधीन हो जाएंगे । हिन्दुओं में सुल्तान का डर समाप्त हो जाएगा । खुदा करे आपको रसूल मुहम्मद का दीदार हो ।"

यह सब बातें सुनकर शेख सुलेमान डर गया और पूछने लगा- "तब हिन्दुस्तान की बादशाहत कौन सम्भालेगा ?"

तब सुन्दरसाथ ने उत्तर दिया- "इन फकीर को अल्लाह ने दीन (धर्म) की बादशाहत दी है, इन्हें लौकिक बादशाहत की कोई चाहना नहीं है । जो भी अल्लाह पर ईमान लाने वाला फकीर होगा, उसके लिए दुनिया मुरदार है ।"

यह बात सुनकर शेख सुलेमान अन्दर से बहुत डर गया । वह सोचने लगा- "यह तो बड़ी महत्वपूर्ण बात है । पता नहीं मुझसे यह कार्य हो भी सकेगा या नहीं ?"

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