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लालदास और गोवर्धन भाई में मतभेद

श्री प्राणनाथ लीलामृत - प्रसंग ८४

लाल दरवाजे की हवेली में श्री जी साहिब जी ने लालदास और गोवर्धन भाई को आदेश दिया- "आप दोनों किसी मस्जिद में जाकर मुल्ला से पूछिए कि कुरान में क्या लिखा है ? वे किसकी इबादत करते हैं ?"

औरंगज़ेब अरबी-फारसी, कुरान और शरीयत के बिना कोई बात नहीं सुनता था । इसलिए उस समय जागनी कार्य में यह उलझन बनी हुई थी कि औरंगज़ेब को उसके आत्मिक स्वरूप की पहचान कैसे कराई जाए ?

लालदास और गोवर्धन भाई ने एक मुल्ला से बात की ।

मुल्ला की बातें सुनकर लालदास जी समझ गए कि कुरान में तो अपने घर (परमधाम) की बातें लिखी हैं और उनका ईमान पक्का हो गया । वे कुरान की बातों पर फिदा हो गए और जोश में बात करने लगे ।

गोवर्धन भाई के दिल में मुसलमानों का डर बैठा हुआ था । वे कहने लगे- "औरंगज़ेब के शासन में हिन्दू होते हुए भी कुरान की बातें सुनने पर दण्ड भुगतना पड़ सकता है ।"

इस बात पर दोनों में झगड़ा हो गया । दोनों रास्ते में बहस करते हुए लाल दरवाजे आए । उस समय सायं सवा पांच बजे थे और श्री जी के भोजन का समय था । श्री जी ऊंची अटारी पर बैठे थे ।

गोवर्धन जी ने जल्दी से ऊपर जाकर श्री जी को मुल्ला की सारी बातें सुना दी । इतनी देर में लालदास जी आए और उन्होंने गोवर्धन को अपनी कही बातें कहते सुना ।

तब लालदास जी ने श्री जी से कहा- "इस चटाई पर हमारा मन और होता है, यहां से अलग होते ही हमें आपकी पहचान नहीं रहती ।"

गोवर्धन जी इस व्यंग्य को समझ गए और क्रोधित होकर बोले- "हे धाम धनी ! आप इन्हें नहीं जानते । ये मेरे लिए ही ऐसी बातें कह रहे हैं ।"

उन दोनों को लड़ते देखकर श्री जी ने दिल में विचार करने लगे- "इन दोनों की बुद्धि पर भरोसा करके मैं कैसे जागनी कर सकता हूं ?"

इस समय श्री जी को बहुत जोश आ गया । उनके अन्दर जिब्रील और इस्राफील फरिश्तों ने बहुत जोर किया । उनके मुख पर बिजली की लहरें चमकने लगीं ।

जोश में श्री जी ने मोमिनों को अलौकिक निधियां बांट दी । शेख बदल को हुक्म की शक्ति, लालदास को साहित्य की न्यामत, मुकुन्द दास को तारतम ज्ञान, और भीम भाई को जाग्रत बुद्धि दे दी ।

इसके बाद श्री जी ने जोश में कहा- "लालदास, आप साहित्य (पुस्तकें) सम्भालिए । भीम भाई और मुकुन्द दास, आप उदयपुर जाइए । गोवर्धन भट्ट, आप सूरत जाइए । मैं स्वयं अनूपशहर जा रहा हूं ।"

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