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फारसी भाषा में पत्र तैयार किए

श्री प्राणनाथ लीलामृत - प्रसंग ८६

श्री जी साहिब जी सब सुन्दरसाथ को लेकर लाल दरवाजा से सराय रोहिल्ला खान आ गए । वहां पहुंचकर उन्होंने निर्णय लिया कि जब तक हम पैगाम को फारसी भाषा में तैयार नहीं करते, तब तक औरंगज़ेब तक बात नहीं पहुंचाई जा सकती ।

अब श्री जी ने दयाराम को हुक्म दिया- "किसी ऐसे आदमी को बुला लाओ, जो हमारे संवाद को फारसी में अनुवाद कर सके ।"

दयाराम कायम मुल्ला को बुला लाए और उसे मासिक वेतन पर इसी काम के लिए रख लिया गया ।

श्री जी ने "शेख जी मीर जी का संवाद" के रूप में एक लघु पुस्तक लिखवाई, जिसमें कयामत के सात निशान, सातों दिन की लीला, आदि के विषय में प्रश्नोत्तर के माध्यम से सारी हकीकत लिख दी गई । यह संवाद फारसी भाषा में लिखा गया ।

"शेख जी मीर जी का संवाद" की जिल्द बांधकर उसके रुक्के (पत्र) तैयार किए गए और सुल्तान के सभी नजदीकी लोगों तक उन रुक्कों को पहुंचा दिया गया ।

सुन्दरसाथ ने एक-एक के घर जाकर पुकार करी, परन्तु कोई भी खुदा की सच्ची राह पर चलने के लिए सावधान नहीं हुआ । सब मुर्दों की भांति दज्जाल (माया) के जाल में बंधे रहे ।

सुल्तान का उस्ताद था शेख निजाम । कई दिन तक सुन्दरसाथ उसके घर का भी चक्कर लगाते रहे, परन्तु वह भी धर्म के मार्ग पर चलने लायक नहीं दिखा ।

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