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कतेब साहित्य में प्रमाण मिले

श्री प्राणनाथ लीलामृत - प्रसंग ८७

सूरत का एक व्यापारी चांदनी चौक (दिल्ली) में रहता था । जब वह श्री जी साहिब जी का दर्शन करने आया, तो उसने बताया कि उसके पास "दज्जालनामा" नामक पुस्तक है ।

श्री जी ने लालदास को उसके पास किताब लेने भेजा । लालदास जी कई दिन तक उसके घर जाते रहे । वह तरह-तरह के बहाने बनाकर अगले दिन देने का वादा करता रहा, अन्त में अपनी बात से मुकर गया ।

पुनः उसी व्यापारी ने लालदास से कहा कि उसके पास "तफ्सीर-ए-हुसैनी" नामक पुस्तक है, जो बहुत महत्वपूर्ण है । लालदास जी के पूछने पर उसने बताया कि उस पुस्तक में कुरान का फारसी भाषा में अर्थ किया गया है ।

लालदास जी ने वापस आकर श्री जी को तफ्सीर-ए-हुसैनी के विषय में बताया । तब श्री जी ने लालदास को हुक्म दिया कि आज ही उस पुस्तक को ले आइए ।

लालदास जी चार दिन तक उस व्यापारी के घर के चक्कर लगाते रहे, परन्तु उसने पुस्तक नहीं दी । तब लालदास ने श्री जी से कहा- "ऐसा लगता है कि पुस्तक देने की उसकी नीयत नहीं है ।"

उस समय वहां पर दयाराम बैठे थे । उन्होंने श्री जी से अर्ज करी कि यह कार्य उन्हें दिया जाए ।

तब श्री जी ने दयाराम को हुक्म दिया- "तुम तफ्सीर-ए-हुसैनी ले आओ । मैं चाहता हूं कि किसी भी तरह से औरंगज़ेब तक सन्देश पहुंचना चाहिए ।"

श्री जी का हुक्म सिर चढ़ाकर दयाराम पुस्तक लेने के लिए निकल पड़े । उन्होंने अपने एक परिचित मुस्लिम व्यापारी से कहा- "मुझे तफ्सीर-ए-हुसैनी की आवश्यकता है । मेरे एक परिचित व्यापारी ने पत्र लिखकर मुझसे यह पुस्तक मंगवाई है ।"

उस मुस्लिम व्यापारी ने शीघ्र ही वह पुस्तक लाकर दयाराम को दे दी और उसके मूल्य स्वरूप अड़तीस रुपये लिए । अब दयाराम की खुशी का ठिकाना नहीं था । वे दौड़कर श्री जी के पास आए और उनके सामने तफ्सीर-ए-हुसैनी रख दी ।

तफ्सीर-ए-हुसैनी देखकर श्री जी बहुत प्रसन्न हुए ।

इस समय श्री जी ने कायम मुल्ला से कहा- "तुम मुझे हिन्दुस्तानी भाषा में इसका अनुवाद सुनाओ ।"

कायम मुल्ला ने सबसे पहले इन्ना इन्जुलना सूरत पढ़ी, जिसमें तीन तकरार (लैल, तुल, कद्र) का वर्णन है । कुरान में लिखे संकेतों के रहस्य स्पष्ट होने लगे कि यह तो ब्रज, रास और जागनी की बात की गई है । यह तो हमारी लीला का ही वर्णन है ।

आगे जब कायम मुल्ला ने इन्ना आतेना सूरत पढ़ी, तो उसमें यमुना जी और हौज़ कौसर की हकीकत मिली ।

यह सब पढ़कर श्री जी की खुशी का ठिकाना नहीं था । उनमें उठने की ताकत ही नहीं रही और वे तीन दिन तक अपनी सेज से उठ नहीं सके और तफ्सीर-ए-हुसैनी में वर्णित खुदाई इल्म को लगातार सुनते गए ।

इसके बाद श्री जी ने सुन्दरसाथ के समक्ष दोनों पक्षों के ज्ञान की साक्षियां मिलाकर चर्चा करी । इससे सुन्दरसाथ को भी बहुत खुशी हुई ।

सभी सुन्दरसाथ को इसका अधिकारी मानकर, श्री जी ने उदयपुर और अन्य स्थानों पर पाती लिखकर इसकी जानकारी दी और उनसे कहा कि वे अन्य सुन्दरसाथ तक भी इस बात को पहुंचाएं ।

उन पत्रों में भीम भाई, मुकुन्द दास, उद्धव भाई, केशव भाई, श्याम भाई, आदि को सम्बोधित करते हुए लिखा था- "मैंने मुहम्मद साहिब की पाती (कुरान) को पढ़ा और उसमें परमधाम की सब हकीकत पाई । संकेत में लिखी उन बातों को वही समझ सकता है, जिसके घर (परमधाम) की वह बात है ।"

अगला प्रसंग- बिहारी जी द्वारा भेजे सुन्दरसाथ का हृदय परिवर्तन