बिहारी जी द्वारा भेजे सुन्दरसाथ का हृदय परिवर्तन
श्री प्राणनाथ लीलामृत - प्रसंग ८८
जब श्री जी साहिब जी दिल्ली में सराय रोहिल्ला खान की हवेली में थे, तब उनको प्रबोधने की आशा से नवतनपुरी से प्रेम दास, नागजी और संगजी आए ।
उन तीनों का ईमान बिहारी जी पर था, जो धनी श्री देवचन्द्र जी के उत्तराधिकार का दावा लेकर गादी पर बैठे थे । ये उस समाज का प्रतिनिधित्व कर रहे थे, जिन्हें श्री जी साहिब जी द्वारा बताए गए सच्चे धर्म के मार्ग निजानन्द से परहेज था ।
वे लोग रसूल मुहम्मद की बातों को सुनना पसन्द नहीं करते थे । हिन्दू और मुस्लिम दोनों पक्षों का परमात्मा एक ही है तथा पैगम्बर मुहम्मद की बातें सत्य हैं, इस पर उनकी कोई आस्था नहीं थी ।
जब वे तीनों दिल्ली के सुन्दरसाथ से मिले, तो वहां मुहम्मद के बिना और कोई बात ही नहीं होती थी । यह देखकर उन्हें बहुत आश्चर्य हुआ । जब उनकी भेंट साक्षात् श्री जी से हुई, तब उन्होंने बहुत जोश में श्री जी को उपदेश दिया । भले ही उनका ज्ञान सारहीन था, फिर भी वे अपने आगे किसी को कुछ नहीं समझते थे ।
इसके बाद जब श्री जी ने चर्चा करी, तब उन्हें श्री देवचन्द्र जी और मुहम्मद साहिब के स्वरूप की वास्तविक पहचान हुई और उनका ईमान जाग्रत हुआ । श्री जी ने स्पष्ट कर दिया कि जो बात मुहम्मद साहिब ने कही, वही बात धनी श्री देवचन्द्र जी ने भी कही, और दोनों का ज्ञान मिलने से एक सत्य धर्म निजानन्द का उदय हुआ ।
जब ईसा रूह अल्लाह (श्री देवचन्द्र जी) का तारतम ज्ञान और मुहम्मद साहिब का कलमा मिल गया, तब उनके मन के संशय मिट गए और उनकी आत्मा जाग्रत हो गई । श्री जी की चर्चा में इतना जोश दिख रहा था कि गादीवाद के समर्थकों का हृदय परिवर्तित हो गया ।
तब उन तीनों ने अपने मुख से स्वीकार किया- "हमने श्री देवचन्द्र जी को श्री मेहेराज के अन्दर देखा है और अब हमको पहचान हो गई है । हमें विश्वास हो गया है कि दोनों पक्षों का खुदा एक ही है और रसूल मुहम्मद की बातें सत्य हैं । हमने तो निश्चय कर लिया है कि आप सच्चे धर्म के मार्ग पर चल रहे हैं । आपके सनन्ध ग्रन्थ के अलौकिक ज्ञान को हम सब तक पहुंचाना चाहते हैं । अब हम सब सुन्दरसाथ को पाती लिखकर सारी सच्चाई बताएंगे और उन्हें श्री जी पर ईमान लाने के लिए प्रेरित करेंगे ।"
इस प्रकार के वचन पाती में लिखकर उन्होंने सब सुन्दरसाथ को भिजवा दिए ।
इस तरह बाईस दिन तक वे तीनों सुन्दरसाथ श्री जी की संगति में रहे । प्रेम दास ने देखा कि नागजी और संगजी बनावटी व्यवहार कर रहे हैं ।
प्रेम दास ने उन दोनों से कहा- "आप दोनों श्री जी के सामने तो ईमान लाने की बातें करते हैं, परन्तु पीठ पीछे कुछ और ही बात करते हैं ।"
इसके बाद प्रेम दास ने उनका साथ छोड़ दिया और श्री जी के चरणों में समर्पित हो गए, जबकि वे दोनों अपना उद्देश्य पूरा करके वापस नवतनपुरी लौट गए ।
श्री जी से अलग होते ही उन दोनों के मन पर शैतान (माया) ने कब्जा कर लिया और उनका ईमान छीन लिया । मार्ग में वे जिस सुन्दरसाथ से मिलते तो संशयपूर्ण बातें करते और श्री जी के बारे में पूछने पर यही कहते कि श्री देवचन्द्र जी के बिना कोई भी परब्रह्म नहीं है ।
जब नागजी और संगजी नवतनपुरी में अपने मित्र बिहारी जी के पास पहुंचे, तो उनसे बोले- "हमारी श्रद्धा सिर्फ श्री देवचन्द्र जी पर है और सत्य तो यह है कि हमने स्वयं उन्हें मेहेराज के अन्दर बैठे देखा है । सद्गुरु महाराज ने उन्हें एक धर्म स्थापित करने का काम सौंपा है ।"
यह बातें सुनकर बिहारी जी का उनसे झगड़ा हो गया और वे रुष्ट होकर बाहर चले गए । सब लोग उनके पीछे दौड़े और उनके चरणों में गिरकर क्षमा मांगने लगे, परन्तु बिहारी जी ने वापस लौटना स्वीकार नहीं किया । वे एक स्थान पर जाकर बैठ गए और किसी की बात सुनने को तैयार नहीं हुए । तीन दिन तक सुन्दरसाथ उन्हें मनाते रहे, तब जाकर वे अपने घर लौटे ।
फिर बिहारी जी को प्रसन्न करने के लिए उन दोनों ने एक-एक स्थान को पाती लिखकर अपनी भूल का सुधार किया और उन्हें स्पष्ट कहा कि कोई भी सुन्दरसाथ श्री मेहेराज पर ईमान न लाए ।
इस प्रकार उन दोनों के मन में श्री जी के प्रति जो श्रद्धा उत्पन्न हुई थी, वह क्षीण हो गई ।
अगला प्रसंग- नलुओं का वृत्तान्त
